ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११. सभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन
हमने देखा कि हम अपने दुख दूर करने की कितनी ही चेष्टा क्यो न करे, परन्तु फिर भी हमारे जीवन का अधिकांश अवश्य ही दुखपूर्ण रहेगा। और यह दुखराशि वास्तव मे हमारे लिये एक प्रकार से अनन्त है। हम अनादि काल से इसी दुःख के प्रतिकार की चेष्टाये करते आ रहे है, किन्तु यह जैसा था वैसा ही अब भी है। हम जितने ही उपाय इस दुःख को दूर करने के लिए निकालते है उतना ही हम देखते हैं कि जगत् मे और भी कितना दुःख गुप्त भाव से विद्यमान है। और भी हमने देखा कि सभी धर्म कहते है कि इस दुःखचक्र से बाहर जाने का एक मात्र उपाय ईश्वर है। सभी धर्म कहते है कि आजकल के प्रत्यक्षवादियो के मतानुसार जगत् जिस रूप मे देखने मे आता है उसी रूप मे यदि लिया जाय तो इसमे दुख को छोड़कर और कुछ भी शेष नही रहेगा। किन्तु सभी धर्म कहते है—इस जगत् के अतीत और भी कुछ है। यह पञ्चेन्द्रियग्राह्य जीवन, यह भौतिक जीवन, केवल यही पर्याप्त नहीं है—वह तो वास्तविक जीवन का अत्यन्त सामान्य अंश मात्र है, वास्तव मे वह अति स्थूल कार्य मात्र है। इसके पीछे, इसके अतीत प्रदेश मे वही अनन्त रहता है, जहाँ दुख का लेशमात्र भी नहीं है, उसे कोई गॉड, कोई अल्लाह, कोई जिहोवा, कोई जोव और कोई और कुछ कहता है। वेदान्ती इसे ब्रह्म कहते है। किन्तु जगत् के अतीत जाना पड़ेगा यह बात सत्य होने पर