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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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पृष्ठ 237

सभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन

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को सूखा डालता नहीं है। वेदान्त में वैराग्य का अर्थ है जगत् का ब्रह्म-भाव—जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमें प्रतिभात होता है उसका त्याग करो, और उसके वास्तविक रूप को पहचानो। उसे ब्रह्म रूप में देखो—वास्तव में वह ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, इसी कारण सब से प्राचीन उपनिषद् में—वेदान्त के सम्बन्ध में जो कुछ भी लिखा गया था उसकी प्रथम पुस्तक में—हम देखते हैं,

'ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्' (ईश० श्लोक १)।

'जगत् में जो कुछ भी है, उसको ईश्वर के द्वारा आच्छादित करना होगा।'

समस्त जगत् को ईश्वर के द्वारा आच्छादित करना होगा; जगत् में जो अशुभ दुःख है, उसकी ओर न देख कर, सभी मङ्गलमय है, सभी कुछ सुखमय है अथवा सभी भविष्य में मङ्गल के लिये है इस प्रकार के भ्रान्त सुखवाद का अवलम्बन करके नहीं, किन्तु वास्तविक रूप से प्रत्येक वस्तु के भीतर ईश्वर का दर्शन करके। इसी रूप से हमें संसार का त्याग करना होगा और जब संसार का त्याग कर दिया तो शेष क्या रहा? ईश्वर। इस उपदेश का तात्पर्य क्या है? तात्पर्य यही है,—तुम्हारी स्त्री भी रहे, उससे कोई हानि नहीं है, उसको छोड़कर जाना होगा इसका कोई अर्थ नहीं, किन्तु इसी स्त्री में तुम्हें ईश्वर-दर्शन करना होगा। सन्तान का त्याग करो—इसका अर्थ क्या है? क्या बाल-बच्चों को लेकर रास्ते में फेंक देना होगा—जैसा कि सभी देशों में नर-पशु किया करते हैं? कभी नहीं—यह तो पैशाचिक काण्ड है—यह तो धर्म नहीं है। फिर क्या करो? सन्तान आदि में ही ईश्वर का दर्शन करो। इसी-