ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसभी वस्तुओं में ब्रह्मदर्शन २४७
अशान्ति नहीं। है केवल पूर्ण एकत्व—पूर्ण आनन्द। तब वे किसके लिये शोक करेंगे? वास्तव मे उस केन्द्र मे, उस परम सत्य मे मृत्यु नही है, दुःख नहीं है, किसी के लिये शोक करना नहीं है, किसी के लिये दुःख करना नहीं है।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥(ईशोपनिषद्, ८ वाँ श्लोक)
"वह चारों ओर से घेरे हुये है, वह उज्ज्वल है, देहशून्य है, व्रणशून्य है, स्नायुशून्य है, वह पवित्र और निष्पाप है, वह कवि है, मन का नियामक है, सब से श्रेष्ठ और स्वयम्भू है; वह सर्वदा ही यथायोग्य सभी के काम्य वस्तुओ का विधान करता है।" जो इस अविद्यामय जगत् की उपासना करता है वह अन्धकार मे प्रवेश करता है। जो इस जगत् को ब्रह्म के समान सत्य समझकर उसकी उपासना करते है वे अन्धकार मे भ्रमण करते हैं, किन्तु जो आजीवन इस संसार की उपासना करते है, उससे ऊपर और कुछ भी लाभ नहीं कर पाते, वे और भी घने अन्धकार मे प्रवेश करते है। किन्तु जिन्होने इस परम सुन्दर प्रकृति का रहस्य जान लिया है, जो प्रकृति की सहायता से दैवी प्रकृति का चिन्तन करते है वे मृत्यु का अतिक्रमण करते है एव दैवी प्रकृति की सहायता से अमरत्व का भोग करते है।
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥