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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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ज्ञानयोग

भी सरल बात नहीं है, यह बात सत्य है । किन्तु मैं आपके सदृश इस विषय का कोई दूसरा वक्ता भी नहीं पा सकता, और इस वर के समान दूसरा कोई वर भी नहीं है ।”

यम बोले--“हे नचिकेता ! शतायु पुत्र, पौत्र, पशु, हाथी, सोना, घोडा आदि माँग लो । इस पृथ्वी के ऊपर राज्य करो, एवं जितने दिन तुम जीने की इच्छा करो उतने दिन तक जीवित रहो । इसके समान और कोई दूसरा वर यदि तुम्हारे मन मे हो तो उसे भी माँग लो, अथवा धन और दीर्घ जीवन की प्रार्थना कर लो । अथवा हे नचिकेता ! तुम विस्तृत पृथ्वीमण्डल पर राज्य करो, मै तुम्हे सभी प्रकार की काम्यवस्तुओं से संयुक्त करूँगा । पृथ्वी में जो जो काम्य-वस्तुएँ दुर्लभ है, उनकी प्रार्थना करो । गीत और वाद्य मे विशारद इन रथारूढ रमणियों को मनुष्य नहीं पा सकता । हे नचिकेता ! इन सभी रमणियों को मैं तुम्हे देता हूँ, ये तुम्हारी सेवा करेगी, किन्तु तुम मृत्यु के सम्बन्ध मे जिज्ञासा मत करो ।”

नचिकेता ने कहा--“ये सभी वस्तुएँ केवल दो दिनों के लिये है, ये इन्द्रियों के तेज को हरण करती है। अतिदीर्घ जीवन भी अनन्त काल की तुलना में वस्तुतः अत्यन्त अल्प है । इसलिये ये हाथी, घोड़े, रथ, गीत, वाद्य आदि तुम्हारे ही पास रहे । मनुष्य धन से कभी तृप्त नहीं हो सकता । जब मै तुम्हे देखूँगा ही, तो इस वित्त की चिर-काल के लिये किस तरह रक्षा कर सकूँगा ? तुम जितने दिन तक इच्छा करोगे, मैं उतने ही दिन तक जीवित रह सकूँगा । मैने जिस वर की प्रार्थना की है, केवल वही वर मै चाहता हूँ ।”

यम इस समय सन्तुष्ट हुए । वे बोले--“परमकल्याण ( श्रेय ) और आपात रम्य भोग ( प्रेय ) इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, ये दोनों