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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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२६ ज्ञानयोग

करते है, विभिन्न युगो के समस्त आदर्शों की आलोचना करते है, तभी इस बात की सत्यता दिखाई पडती है। एक समय था जब कि सुन्दर तेजस्वी घोड़ो की जोड़ी को हाँक कर चलाना ही मेरा आदर्श था, अब वह भावना नहीं होती। बचपन मे सोचता था कि अमुक मिठाई प्रस्तुत कर लेने पर मै पूर्ण सुखी होऊँगा। कभी सोचता था, स्त्री-पुत्र से युक्त तथा प्रचुर धनसम्पन्न होने पर सुखी होऊँगा। अब वे सब लड़कपन की बाते सोच कर हँसी आती है। वेदान्त कहता है कि जिन समस्त आदर्शों का अवलम्बन करते हुए, अपने शारीरिक व्यक्तित्व का परिहार करने मे, हममे भय का सञ्चार होता है, समय आने पर उन्ही आदर्शों को देखकर हम हँसेगे। सभी अपनी अपनी देह की रक्षा करने मे व्यग्र है। कोई भी इसका परित्याग करने की इच्छा नही करता। इस देह की यथेच्छ समय तक रक्षा कर लेने पर हम अत्यन्त सुखी होगे, हम सब इसी रूप मे सोचते है। किन्तु समय आने पर यह बात भी याद करके हम हँसेगे। अतएव, यदि हमारी वर्तमान अवस्था सत् भी नही है, असत् भी नही है—किन्तु दोनो का संमिश्रण है, असुख भी नही है, सुख भी नहीं है—किन्तु दोनो का ही संमिश्रण है, इस प्रकार का विषम विरुद्ध भाव जब उत्पन्न हुआ तब वेदान्त की आवश्यकता क्या है? अन्यान्य दर्शनशास्त्र तथा धर्ममतादिको की भी क्या आवश्यकता है? विशेषतः शुभ कर्म आदि करने का ही क्या प्रयोजन है? यही प्रश्न मन मे उठता है, कारण, लोग यही पूछेगे कि यदि शुभ कर्म करने का यत्न करने पर अमंगल रहना ही है एव सुखोत्पादन का यत्न करने पर पर्वत के समान असुख की राशि उपस्थित हो जानी है तब फिर इस यत्न की आवश्यकता ही