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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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३२ ज्ञानयोग

हमे साम्यभाव से च्युत नहीं कर सकेगे और छाया के पीछे पीछे दौड़ा नहीं सकेगे। अतएव संसार की गति ही ऐसी है यह जान कर हम सहिष्णु बनेगे। उदाहरण स्वरूप हम कह सकते है कि सभी मनुष्य दोषशून्य हो जायेगे, पशु भी मनुष्यत्व प्राप्त कर इसी अवस्था में से होकर गुजरेगे और वनस्पतियो की भी यही दशा होगी। किन्तु यह एक बात निश्चित है—यह महती नदी प्रबल वेग से समुद्र की ओर बह रही है; तृण, पत्ते आदि सब इसके स्रोत मे बह रहे है और सम्भवत विपरीत दिशा में बहने की भी चेष्टा कर रहे है, किन्तु ऐसा समय आयेगा जब प्रत्येक वस्तु उस समुद्र के वक्षःस्थल मे खिंच कर पहुँच जायगी। अतएव, जीवन समस्त दुःख और क्लेश, आनन्द, हास्य और क्रन्दन के सहित उसी अनन्त समुद्र की ओर प्रबल वेग से प्रवाहित हो रहा है, यह निश्चित है और केवल समय का प्रश्न है जब कि तुम, मै, जीव, उद्भिद् और साधारण जीवाणु रूप जो कुछ भी जहाँ पर है, रह चुका है, सब कुछ उसी अनन्त जीवन-समुद्र में—मुक्ति और ईश्वर में पहुँचकर रहेगा।

मै एक बार फिर कहता हूँ कि वेदान्त का दृष्टिकोण आशावादी अथवा निराशावादी नहीं है। यह संसार केवल मंगलमय है अथवा केवल अमंगलमय है ऐसा मत यह व्यक्त नहीं करता। वह कहता है कि हमारे मंगल और अमंगल दोनो का मूल्य बराबर है। ये दोनो इसी प्रकार हिलमिल कर रहा करते है। संसार ऐसा ही है, यह समझ कर तुम सहिष्णुता के साथ कर्म करो। किन्तु किम क्रिय? यदि घटनाचक्र इसी प्रकार का है तो हम क्या करे? हम अज्ञेयवादी क्यो न हो जायें? आजकल के अज्ञेयवादी भी तो कहते है कि