भारतकोश
ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

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३८ ज्ञानयोग

समाप्त हो जाता है, और कोई कहते हैं कि, नही, उसका अस्तित्व फिर भी रहता है, इन दोनों बातों में कौन सी सत्य है ? (येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये, अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके)।” जगत् मे इस सम्बन्ध मे अनेक प्रकार के उत्तर मिलते है। जितने प्रकार के दर्शन या धर्म संसार मे है वे सब वास्तव मे इसी प्रश्न के विभिन्न रूप के उत्तरो से परिपूर्ण है। अनेक तो ऐसे है जिन्होंने इस प्रश्न को ही—प्राणों की इस महती आकांक्षा को—संसार से अतीत परमार्थ सत्ता के इस अन्वेषण को—व्यर्थ कह कर उड़ा देने की चेष्टा की है। किन्तु जब तक मृत्यु नाम की कोई वस्तु जगत् मे है तब तक इस प्रश्न को यो ही उड़ा देने की सारी चेष्टायें विफल रहेगी। यह कहना सरल है कि हम जगत् के अतीत की सत्ता का अन्वेषण नहीं करेगे, वर्तमान क्षण मे ही हम अपनी समस्त आशा, आकांक्षा को सीमित रक्खेगे; हम इसके लिये भरपूर चेष्टा कर सकते हैं और वहिर्जगत् की सब वस्तुये ही हमे इन्द्रियो की सीमा के भीतर बन्द करके रख सकती है, सारा संसार मिलकर वर्तमान की क्षुद्र सीमा के बाहर दृष्टि प्रसारित करने से हमें रोक सकता है; किन्तु जितने दिन जगत् मे मृत्यु रहेगी उतने दिन यह प्रश्न बार बार उठेगा—हम जो इन सब वस्तुओं को सत्य का सत्य, सार का भी सार समझ कर इनमे भयानक रूप से आसक्त है, क्या मृत्यु ही इस सब का अन्तिम परिणाम है ? जगत् एक क्षण मे ही ध्वंस होकर न जाने कहाँ चला जाता है। ऊँचे गगनस्पर्शी पर्वत के नीचे की गम्भीर गुफा मानो मुँह फैलाये जीवो को निगलने को आरही है। इस भीषण पर्वत के पास खड़े होकर, कितना ही कठोर अन्तःकरण क्यो न हो, निश्चय ही सिहर उठेगा और पूछेगा—यह सब क्या सत्य