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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

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मनुष्य का यथार्थ स्वरूप

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ठीक वहीं हुआ। जो मत अन्यान्य मतों का खण्डन किये बिना ही, चाहे उसमे सब का समन्वय न हो, अधिकांश घटनाओ की, अधिकांश विषय की व्याख्या कर सकता है वही ग्राह्य है। अतएव यही बात युक्तिसंगत है कि जो शक्ति जड़राशि को लेकर उसमें से शरीर का निर्माण करती है और जो शक्ति शरीर के भीतर प्रकाशित रहती है ये दोनों एक ही है। अतः यह कहना कि “जो चिन्ता-शक्ति हमारे शरीर मे प्रकाशित होती है वह केवल जड़ अणुओ के संयोग से उत्पन्न होती है और इसीलिये शरीर से पृथक उसका कोई अस्तित्व नहीं” बिलकुल ही निरर्थक है। और शक्ति कभी जड़वस्तु से उत्पन्न हो नहीं सकती। वरञ्च यह प्रमाणित करना अधिक सम्भव है कि हम जिसे जड़ कहकर पुकारते है उसका अस्तित्व ही नही है। यह केवल शक्ति की एक विशेष अवस्था है। यह सिद्ध किया जा सकता है कि काठिन्य आदि जो जड़ के गुण है वे सब विभिन्न रूप के स्पन्दनो के फल है। जड़ परमाणुओं के भीतर प्रबल स्पन्दन या कम्पन उत्पन्न कर देने से वे कठिन हो जायेगे। थोड़ी सी वायुराशि मे यदि अतिशय प्रबल गति उत्पन्न कर दी जाय तो वह मेज के काठ से भी अधिक कठोर मालूम होगी। अदृश्य वायुराशि यदि प्रबल झटके के साथ गतिशील हो जाय तो वह लोहे के डण्डे को मोड़ देगी और तोड़ देगी—केवल गतिशीलता के द्वारा ही उसमे कठिनता का धर्म या गुण उत्पन्न हो जायगा। इसी दृष्टान्त से यह कल्पना भी की जा सकती है कि अननुभाव्य अजड़ ईथर को यदि प्रबल चक्र की गति से चलाया जाय तो इसमे जड़ पदार्थों के सभी गुणो का सादृश्य दीख पड़ेगा। इसी प्रकार से विचार करने पर यह पूर्ण रूप से सिद्ध किया जा सकता है कि