भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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( ९ ) इसका निष्कर्ष यह है कि—महाभारत के ही प्रमाण वचनों से सिद्ध होता है कि महाभारत युद्धकाल से बीस वर्ष बाद धृतराष्ट्र का परलोक-वास हुआ था। धृतराष्ट्र के मरने के बाद और जनमेजय के सर्पसत्र के पूर्व महा- भारत की रचना हुई है। जनमेजय का अभिषेक कलि के ६० वर्ष अथवा ९६ वर्ष बीतने पर हुआ। महाभारत आदि पर्व ४९।१७ और सौप्तिक पर्व १६।१५ में लिखा है कि राजा परीक्षित ने ६० वर्षों तक राज्य किया और कलि गताब्द ३६ के बाद उनका शासन आरम्भ हुआ। इसके अनुसार महाराज जनमेजय का अभिषेक काल कलिगताब्द ९६ वर्ष प्रमाणित होता है। आदिपर्व ४९।२६ के अनुसार ६० वर्ष की व्यवस्था में परीक्षित का देहान्त हुआ। परीक्षित का जन्म काल और कलियुग का आरम्भ काल एक ही है। इसके अनुसार जनमेजय का अभिषेक कलि गताब्द ६० में ही प्रमाणित होता है। जिन श्लोकों में ६० वर्षों तक शासन करने की बात कही गयी है उनका अभिप्राय भी ६० वर्षों तक की व्यवस्था से ही समझना चाहिये। जनमेजय का राज्या- भिषेक छोटी ही अवस्था में हुआ था। अतएव अभिषेक के २४ वर्ष बाद सर्प सत्र हुआ था। इससे यह भी प्रमाणित हो जाता है कि महाभारत की रचना कलिगताब्द २० वर्ष के बाद और कलिगताब्द ८४ वर्ष के पूर्व हुई। महाराज युधिष्ठिर कलिगताब्द ३६ में भगवान् श्रीकृष्ण के परम धाम पधारने के पश्चात् दिवंगत हुए थे। यह महाभारत संहिता युधिष्ठिर के विजयोपलक्ष्य में जयेतिहास के रूप में अनेक उपाख्यानों के साथ रची गई थी। अतः उसकी रचना युधिष्ठिर के राजत्व काल और भगवान् कृष्ण के परम धाम पधारने से पहले ही हुई थी। यह स्वाभाविक बात है कि जिस राजा का विजय इतिहास लिखा जाता है, वह प्रायः उसके शासन काल में ही लिखा जाता है। अतएव कलिगताब्द २० वर्ष बाद महाराज धृतराष्ट्र के स्वर्गवास के पश्चात् युधिष्ठिर के शासन काल में ही कलिगताब्द ३६ के पूर्व ही महाभारत की रचना प्रमाणित होती है। महाभारत की रचना तीन वर्षों में पूर्ण हुई थी। श्री गणेश जी ने उसे लिखा था। इस प्रकार महाभारत का रचना काल विक्रम

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