भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ६६ ) इसका उत्तर यह है कि जैसे आहुति प्रदान रूप मुख्य यज्ञ नवग्रहादि पूजन रूप कृत्यों का सहिष्णु होता है, वैसे ही अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग रूप मुख्य युद्ध चार दिनों का अतिरिक्त व्यवधान सह सकता है। क्योंकि युद्ध-मर्यादा रूप व्यवधान तो व्यास वचन से ही सिद्ध है। शेष व्यवधान 'सैन्य शिक्षण और स्वस्तिवाचनादि' संकेतों से अनुमेय है। अवकाश-दिन से पूर्व यदि कार्यालय का कोई अधिकारी सेवकों से कहे— “अब आज कार्यालय बन्द कर दो, शेष कार्य 'कल' करूँगा" तो उसके इस वचन का अभिप्राय जैसे एक दिन बाद समझा जायगा, यदि इसी शैली में भीष्मजी का उक्त सामान्य वचन मान्य हो तब तो यह संगति उपयुक्त है। अन्यथा भीष्म प्रतिज्ञा की तरह भीष्म-वचन ही पूर्ण सत्य रहने दिया जाय और अठारह दिन लगातार युद्ध मान कर श्रीनीलकण्ठाचार्य की शैली में श्रीबलभद्र वाक्य के सर्वंथा अनुगुण श्रवण नक्षत्र और उसके अनुकूल तिथि से सत्रह दिन पूर्वं मार्गशीर्ष शुक्ल मृगशिरा नक्षत्र में ही युद्धारम्भ उपयुक्त माना जाय ? रही 'सप्तमाच्चापिदिवसात्' के अनुसार पुष्य के सातवें दिन ज्येष्ठा नक्षत्र की बात ? तो पहले की तरह 'ज्येष्ठा' को ऐन्द्र नक्षत्र मानकर तथा मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी से अमावास्या तक एक तिथि एवं उसके अनुगुण एक नक्षत्र का क्षय मानकर पुष्य से नवें स्थान पर ज्येष्ठा है, अतः 'सप्तमाच्चापि' का 'एक सप्ताह बाद अर्थात् मार्गशीर्ष कृष्ण पञ्चमी पुष्य के पश्चात् नवें दिन' ऐसा भावार्थ ग्रहण करना चाहिये । अवकाश-रहित अब प्रतिदिन लगातार अठारह दिनों तक युद्ध को प्रमाण मानकर मार्ग- शीर्ष शुक्ल दशमी, द्वादशी या त्रयोदशी तक युद्ध के अनारम्भ की दृष्टि से विचार प्रारम्भ किया जाता है— नवीन पञ्चाङ्गों के अनुसार तथा प्रचलित प्रसिद्धि के अनुसार गीता जयन्ती मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को सिद्ध होती है । नक्षत्र गणना के अनुसार मार्गशीर्ष पूर्णिमा मृगशिरा या आर्द्रा में संभव है, अतः शुक्ल एकादशी को अश्विनी और भरणी नक्षत्र होना चाहिये । अश्विनी