भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished115 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

( ७८ ) यह निर्विवाद सत्य है कि भीष्म निर्वाण सम्बन्धी चारों वचन कूटार्थक हैं। ये कालकूट (काल सम्बन्धी कूट) कालकूट के समान भयंकर हैं। अतः कूटभेदी प्रक्रिया से ही इनका समाधान संभव है। अन्यथा संबन्धित समस्त वचनों का सामञ्जस्य असंभव है। 'तत्र ते सुमहात्मानो न्यवसन् पाण्डुनन्दनाः । शौचं निर्वर्तयिष्यन्तो मास मात्रं बहिः पुरात् ॥' का अन्तरङ्ग तात्पर्य--'युद्धारम्भ से अशौच निवृत्ति और शौच सम्पादन तक कुल तीस दिन व्यतीत हुए' ऐसा व्यक्त करने में है। 'द्वादशाहेन भूमिपः' (मनुस्मृति ५।८३) इस स्मृति वचन के अनुसार क्षत्रियों को शुद्धि प्राप्त करने के लिए बारह दिनों की ही अपेक्षा होती है। अतः महा- भारतकार ने अतिरिक्त ३० - १२ = १८ दिनों का उल्लेख इस महत्त्वपूर्ण अभिप्राय से किया है कि महायुद्ध केवल अठारह दिनों तक हुआ। अभिप्राय यह कि क्षात्रधर्म की रीति से देहत्याग करने वाले वीरों की मृत्यु से प्राप्त अशौच की दैनिक शुद्धि युद्ध काल में ही हो जाती थी— उद्यतैराहवे शस्त्रैः क्षत्रधर्म हतस्य च । सद्यः संतिष्ठते यज्ञस्तथाऽऽशौचमिति स्थितिः ॥ ( मनुस्मृति ५।९८ ) फिर भी सौप्तिक संहार के और पूर्व मृतकों के दाह संस्कार से प्राप्त अशौच की निवृत्ति बारह दिनों में हुई। अतः युद्धान्त के पश्चात् पाण्डव बारह दिनों तक नदी तट पर ही बने रहे। इस तरह पौष शुक्ल द्वितीया से पौष शुक्ल त्रयोदशी तक शौच सम्पादन में व्यतीत हुआ। पौष शुक्ल चतुर्दशी को पाण्डव हस्तिनापुर में प्रविष्ट हुए। पौष पूर्णिमा 'पुष्य' नक्षत्र में श्रीधर्मराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। माघ कृष्ण प्रतिपदा को अन्यकृत्य तथा यथा योग्य महलों में निवास कर द्वितीया को भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पाण्डव भीष्माचार्य की सेवा में कुरुक्षेत्र आये। भगवान् श्रीकृष्ण से प्राप्त दिव्यदृष्टि और दिव्यशक्ति सम्पन्न भीष्माचार्य द्वारा उपदेश की स्वीकृति प्राप्त पाण्डव परिकर सहित हस्तिनापुर लौट आये।