काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ से ही माघ कवि ने अपना शिशुपालवध काव्य लिखा है । संवत् ९७७ के इस ग्रन्थ के टीकाकार वल्लभदेव महाभारत ग्रन्थ को सवा लाख श्लोकों का मानते हैं। वे शिशुपालवध के २।३८ की टीका में लिखते हैं 'सपादलक्षं श्री महाभारतम् ।' सवा लाख श्लोकों वाला महाभारत वाविला प्रेस मद्रास-१ से भी छप चुका है । संवत् ९५७ के राजशेखर भी अपनी काव्यमीमांसा (अ० ३) में महाभारत को शतसाहस्रीसंहिता कहते हैं । विक्रम की आठवीं शताब्दी के आचार्य आनन्दवर्धन अपने ध्वन्यालोक में महाभारत के शान्तिपर्व के १५२ अध्याय के गृध्रगोमायुसंवाद का उल्लेख करते हैं। वे महाभारत के आदि पर्व के पहले अध्याय (अनुक्रमणी) को एवं हरिवंश को भी महाभारत का अंश मानते हैं— 'ननु महाभारते यावानपि विवक्षाविषयः सोऽनुक्रमण्यां सर्व एवानुकान्तः.... महाभारतावसाने हरिवंशवर्णनेन समाप्ति विदधता तेनैव कविबेधसा कृष्णद्वैपायनेन सम्यक् स्फुटीकृतः' (ध्वन्यालोक ४ उद्योत कारिका ५) । संवत् ६८७ के वल्लभी निवासी ऋग्वेदभाष्यकार आचार्य स्कन्दस्वामी अपने भाष्य में महाभारत के अनेक आख्यानों का निर्देश करते हैं— 'भारते तु ऋषयः शापात् सरस्वतीं मोचयामासुरित्याख्यानम्' (ऋ० सं० १।११२।९) यह आख्यान शल्य पर्व के ४४ वें अध्याय में है । सप्तम शताब्दी में विद्यमान आचार्य दण्डी कवि अपनी अवन्तिसुन्दरी में महाभारत एवं उसके रचयिता महर्षि वेदव्यास का स्मरण करते हैं— 'मर्त्ययत्नेषु चैतन्यं महाभारतविद्यया । अर्पयामास तत्पूर्वं यस्तस्मै मुनये नमः ॥' (मङ्गलाचरण श्लोक ३) दण्डी से पूर्वभावी बाण अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ कादम्बरी एवं हर्षचरित में महाभारत की कथाओं का अनेक प्रकार स्मरण करते हैं ।