काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८० ) द्वितीय पक्ष यह सत्य है कि भीष्म निर्वाण से सम्बन्धित 'मास मात्रं' 'पञ्चाशतं षट्' 'पञ्चाशत्' और 'अष्ट पञ्चाशतं रात्र्यः' इन चारों का निर्विरोध सामञ्जस्य बिठाने के लिए चारों का ही गौणार्थ स्वीकार करना होगा । नहीं तो पौषकृष्ण तृतीया को भीष्मपतन मानकर माघी तक भीष्म जी के अट्ठावन दिन भी पूर्ण होंगे और तीस दिन उसी के अन्तर्गत गंगा तट पर पाण्डवों के यद्यपि पूर्ण हो जायेंगे, परन्तु इस तरह दो वचनों को यथार्थ स्वीकार करने पर 'पञ्चाशतं षट् च' और 'पञ्चाशत्' ये दो वचन पूर्ण रूप से उपेक्षित रह जायेंगे । परन्तु ऐसा अभीष्ट नहीं, अतः चारों का गौणार्थ यद्यपि पूर्व रीति से सुन्दर ढंग से घटित होता है, फिर भी इस सम्बन्ध में यह विचार करना आवश्यक है कि श्रीगीता जयन्ती की प्रसिद्ध तिथि यद्यपि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी है, परन्तु उसकी प्रसिद्धि अर्वाचीन सिद्ध होती है, जब कि माघ शुक्लाष्टमी भीष्माष्टमी के रूप में उसकी अपेक्षा प्राचीन काल से प्रसिद्ध है । 'माघोऽयं' के साथ 'त्रिभागशेषः' का अन्वय करते समम श्रीनीलकण्ठाचार्य ने भी इसे स्वीकार किया है । अतः इसके अनुगुण ही शेष वचनों के समन्वय का सामञ्जस्य बिठाना आवश्यक है, इसी दृष्टि से यह द्वितीय गणना है— माघोऽयं समनुप्राप्तो मासः सौम्यो युधिष्ठिर । त्रिभागशेषः पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति ॥ ( अनुशा० १६७।२८ ) इस श्लोक में यद्यपि 'पक्षोऽयं शुक्लो भवितुमर्हति' के साथ 'त्रिभागशेषः' पठित है । इस दृष्टि से माघ शुक्ल दशमी की सिद्धि होती है । क्योंकि दशमी के बाद पक्ष का त्रिभाग ( पाँच दिन ) शेष रहता है । परन्तु माघ शुक्ला दशमी भीष्म जी के देहत्याग की तिथि रूप में प्रसिद्ध नहीं है । साथ ही ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का अनुशीलन करना चाहिए जिसके द्वारा तिथि एवं दिन दोनों का ग्रहण हो । तिथि का ग्रहण हो जाने से शुक्ल पक्ष के साथ 'त्रिभागशेषः' के अन्वय की आवश्यकता नहीं रह जाती । साथ ही दिन का समय निश्चित हो जाने पर दिवस के साथ 'त्रिभागशेषः' के अन्वय की आवश्यकता नहीं रह