काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
( १०४ ) अक्षरशः सत्य सिद्ध करने के लिए ही श्रीकवीश्वर ने अवकाशयुक्त सिद्ध करने की असम्भव कल्पनाएँ करने का साहस किया है, उन्हीं भगवान् के 'पञ्चाशतं षट् च' ( शान्ति० ५१।१४ ) इस वचन पर मौन धारण कर लिया है । साथ ही कवीश्वर पूर्णिमा की उत्तर रात्रि में तीन मुहूर्त रात्रि शेष रहने पर भीष्म जी का देहत्याग मानते हैं । परन्तु ऐसा मानने पर 'त्रिभागशेषः' का प्रसंगानुसार प्राप्त महत्त्व ही लुप्त होता है । डाक्टर काणे एवं दफ्तरी आदि ने मार्गशीर्ष अमावास्या से पौषकृष्ण द्वितीया तक लगातार युद्ध माना है। परन्तु ऐसा मानने पर भी श्रवण को युद्धान्त संभव नहीं । साथ ही आठवें, नवें, ग्यारहवें दिन के युद्ध में शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और दशमी सिद्ध होती है। परन्तु महाभारत में इन दिनों सायंकाल अन्धकार का वर्णन है। चौदहवें दिन शुक्ल त्रयोदशी होने के कारण उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय वाला वचन भी निष्फल जाता है । फिर भी इन विचारकों के प्रयास की सराहना है । किन्तु हैं सारे-के-सारे विचार तथ्यहीन ही । उपसंहार महाभारत में समग्र सृष्टि का रस और रहस्य सन्निहित है । इसमें अनेक प्राचीनतम इतिहास भी सन्निहित हैं । साथ ही रचयिता—महर्षि श्रीकृष्ण द्वैपायन वेदव्यास ने निज बन्धु-बान्धवों और सगे-सम्बन्धियों ( कौरव-पाण्डवों ) का मार्मिक इतिहास भी इसमें ग्रथित किया है । अभिप्राय यह कि महाभारत में वर्णित कौरव-पाण्डव का इतिहास एक दृष्टि से श्रीवेदव्यास के निज परिवार का ही इतिहास समझना चाहिये । अतः इस पारिवारिक इतिहास को इतिहास न समझ कर आधुनिक उपन्यासों की तरह काल्पनिक मानना सर्वथा अनुचित है । ऐसा मानने पर तो लेखक के जन्म-कर्म और उससे संबद्ध चरित्र सभी मिथ्या सिद्ध होते हैं। इस प्रकार की अनर्गल कल्पना सर्वथा अशोभनीय है । महाभारत को प्रमाण मानकर ही इस पर प्रामाणिक विचार कर्तव्य है । ॥ इति शम् ॥