भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१०१

देह सुक करे सो पावे । पाप पुण्यमहैं आवे जावे ॥ गाढके हीन सो दानहि पावे । तेहि औसर साकट पछतावे ॥

दोहा—देह सुक थह जानहु, देह धरे फल पाव ।

सत्यकबीर जो सुमरे तो, बहुर योनि नहिं आव। रज तम लक्षण भूत पिशाचा । सतगुण साधु संत प्रकाशा ॥ रज तम चाल परे चौरासी । सतगुण देह सुक विश्वासी ॥ कर्म भ्रमकी छूटे आसा । आवागैन निरंजन फांसा ॥ निरंजन सेवक कबीरको अंसा । कबीर जेमुख तेहि विषंसा ॥

दोहा—खरा खोटा सब पाखे, पारसी निरंजन राय ।

पुरुष प्रवाना देखि सिर नावे, विना छाय धरखाय ॥ कहे कृष्ण पंनग अरि सुनहू । कहूं ज्ञान अपने मन गुनहू ॥ सतगुरु भक्त पपील चलानी । निरगुण भक्त विहँग बखानी ॥ पंछी विहँग उड जाय अकाशा । नहिं पपील चढ सके बेआसा ॥ जहां इच्छा तहैं जाय विहँगा । चढ़ि सरगुण मता अुअंगा ॥ कोट माहि सरगुण गति पावे । निरगुण भक्त सबे तर जावे ॥

दोहा—निरगुण महिमा अगम है, सरगुण सके न कोय ।

सरगुण उपजन विनसन, निरगुण विन गति नहिं होय ॥ सतयुत नेता द्वापर काली । चहुँगुण निरगुण अजर अमाली निरगुण सरगुण सबके मूला । सोई सत्यकबीर हरि बोला ॥

दोहा—हमरी तुम्हरी को कहे, कबीर सबनके मूल ।

कहे कृष्ण सुने खगपती, को कबीर सम तूल ॥