भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

१०३

व्याससुखदेववचन ।

व्यासदेव सुखदेव मिल बोले । देहु शरण यम डर मह डोसे ॥ विलखत वदन व्यास सुनि भाषी । कवीर शरण लेहु मोही राखी ॥

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सोइ यमसे बांचा । निज२शब्द कहा यम सांचा ॥ अब तुम होहु निहसंक यमसेती । देउ बीरा चल यमसो जीती ॥ दीन्ह प्रवाना त्रिण तोढाई । व्यासदेव सुखदेव कयाई ॥ चरणोदक महाप्रसाद तब दीन्हा । बहुरसिखापनजीवदयाकोकीन्हा हम कहैं गुप्त हृदय महाँ राखहु । साधु गुरु हरि महिमा भाषहु ॥ साधु गुरु हरिरूप हमारा । हमरे नाम भज यमसो न्यारा ॥ बेदशास्त्र सुभत जहाँ ताई । सबपर ज्ञान सदुरुको साई ॥ कृष्ण अर्जुन गीता तुम भाषहु । ज्ञान पाठ गीता अब राखहु ॥ हम कह इच्छा देहु प्रवाना । सतकवीर कहैं सुना भगवाना ॥ हमरे भेटहु आवा गवना । लेचल निज घरबहुनअवना ॥ सुनेउ राम बसिष्ठसे रामा । कौन नाम दीन्हो गुरु रामा ॥ जो तोहि पान दे लोक पठाई । तो सतरंजबाजी उठ जाई ॥ विष्णुसयान तिहु लोक न कोई । सतनाम सभ वरत न कोई ॥ क्रितम उपज विनस दुख पायो । आद अजर घर अमर रहायो ॥ जो तुम जैहो अमरलौका । निराकार कहैं होइहै शोका ॥ हम विष्णु जो नाती आज्ञा । बाप तुरक कह कौने काजा ॥ सपूत पुत्र तेहि प्रोजन देई । विन सुचील सुत पान न लेई ॥