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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१ ३१

विष्णुवद्भन ।

हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥

दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।

बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।

कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥

दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।

श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥

कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥

कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥

पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥

कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥

लक्ष्मीबचन ।

लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥

कबीरबचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।

तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥

अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥

पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥

दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।

पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥

सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥

जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥