कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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विष्णुवद्भन ।
हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥
दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।
बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।
कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥
दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।
श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥
कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥
कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥
पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥
कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥
लक्ष्मीबचन ।
लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥
कबीरबचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।
तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥
अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥
पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥
दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।
पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥
सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥
जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥