कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सत्यनामके एक रोम छवि, तुले न कोटि अनंत । अदुत शोभा कह कहों, कोट अनंत सूर चंद ॥ शीतल रवि सतलोक मझारा । अगिनसूरज भयो तब निराकारा अगिनको रास निरंजन काया । अभितरास पुरुष पगु छाया ॥ हंसन काया कंचन सूंचा । कोटिन रवि विधि सरिस न पहुँचा विष्णुके काया कंचन आभा । जैसे अन्नके अगुवा भाभा ॥ स्याम भये हरि पितके खोजा । अरि विष झार स्यामतन बोजा ॥ ब्रह्मा ताम रुद्र तन लोहा । लरगा इंद्रका मत फंद मोहा ॥ प्रेत खान विष्टाके देहा । नरक देह नर नार उरेहा ॥ चौरासी लक्ष योनी खानी । नरककी नार सो अंकुर जानी ॥ कोइ एक हंस अंकुरी होई । अंकुर पावहिँ अभिष न जोई ॥ अंकुरी जो भजे सतनामा । तो सब सुधरे वाको काया ॥ सत्यनाम कबीर बखाना । कहैं जनार्दन वचन प्रवाना ॥
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु सुन नारद व्यासा । नाम कबीर भजो सुखरासा ॥
दोहा-सकल जीव गायत्री, बांध निरंजन राय ।
सत्यकबीर सो रक्षक, कहैं कृष्ण समुझाय ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा कहैं सीस सुई लाई । सत्यकबीर मोहिँ कहहु बुवाई ॥
केतिक दूर आहि सतलोक । जहां रहहिँ सब हंस निसोका ॥
सत्यकबीर सत्यपुरुष अमाना । न्यारा सबसे सकल अमाना ॥
अजर अमर सत्पुरुष अजावन । जिन भज सतकबीर गुरुपावन ॥