कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 168 में से
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कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥ सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥ सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥ षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥ रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥ आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥ केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥ सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥ वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥ कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥ जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥ षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥ द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥ अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥ सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥ कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥ अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥ भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥