भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

पांच तीन बस तन अघखानी । सट्टरु सेव हंस पिल जानी ॥ तन विदेह विन घरको भवन है । पांच तत्त यन कहांसोरंगहै ॥ यथयम कहेउं पंच सैल ततुरंगा । सुन भूलेहु तुम खाहु बहु भंगा ॥ योगी सोहंग तन सिंगी बजावे । सहज आसन तन विभूत रभावे ॥ हटताई दिब्बी अमीगत ठपना । सबे विगाना सट्टरु अपना ॥ चावल प्रीत चेतन दिल दाला । ब्रह्म अगिन कमल परजाला ॥ निरगुण नाम निमक सो सब रस। तेज पात विश्वास सो अदरख ॥ प्रेम सुचित सो घीव जीवन । काया क्षीर यथे कोई गुरुजन ॥ पारस पान प्रसाद चढाये । अमी नीर कबीर पियाये ॥ दया दही गऊ घृत सुच दूधा । खोवा काम क्रोध घर सोधा ॥ गरस प्रसाद विरान सुरत सेवक । शुभ आशिष देहिं गुरुदेवक ॥ अजर अमर घर वर मिल आशिष । पिया रूपरस जगमें अतिसुन ॥ पिष हिय पैठि सेवककेरा । जन्म मरनका करे नवेरा ॥ भया निवेरा सो कस हूवा । पांच पचीस त्रिगुन तन जूवा ॥ अजर अमर अविचल सो काया । अमर लोक सबे सुख पाया ॥ कहैं कबीर छूटेउ सब संसा । तरे इकोतर पिछले वंसा ॥ सट्टरु शरण हाथिगत पुरुषा । खसम कबीरहिं लखेन न सुरखा ॥ कहैं कबीर तन भुवन चतुर्दश । चौदह संग चालक जीव सर्वसा ॥ चौदह संग जब बाहर होई । सत कहे सट्टरु शरण समोई ॥ अजरलोक पगु अधर बखाना । निज पगु अरध चितल परजाना ॥ तीन लोक उरध तेह ताको । लोक तलातल जंघ अस्थापो ॥ लोक माहिं तल इंदुकी वारी । मलस्थान रसातल खारी ॥ कटि पताललोक विस्तारा । सान दीप नभ अधर उचारा ॥