कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
भिक्षा पटार और खरचारा । भवै मीन सो सूतक झारा ॥ मीन कीरा सो तुरत मगाये । शूद्र हाथ दे राय पठाये ॥ नारद देख कोप होय ऊठे । लेहिं न मीन जाय तब रुठे ॥ जाय दास नृप सो अथाई । ब्राह्मण रुठा जाय गोसाई ॥ उठे कबीर राय तेहि बारा । आय ठाढ़ भै सिंह दुवारा ॥ आपन रूप छिपाय कबीरा । साधुरूप होय मुनिसो भीरा ॥ कहै साधु सुन जपके अंसा । सर्व मांस तैं भष निहंससा ॥ नारद कहै जीवन जिव मारी । सबकर मांस मैं भषत अहारी ॥ कहै कबीर राजासों वाणी । कलिके विष जाय अघखानी ॥ अब नृप मालुष बहुत बोलावहु । तिनते सब तर रुधिर मंगावहु ॥ जीवन मरे रुधिर सब चाही । सप सरोय अब सबके लाही ॥ एक कहत धाये शत कोटी । लाये हेर रुधिर भर लोटी ॥ सो ले धरा ऋषीके आगे । सर्व मांस अब लेहु अभागे ॥ लोहूते होय मांस तुच हाडा । सर्व मांस भषतैं अब गाढा ॥ नारद देख अचंभा भयऊ । हो नृप यह बुध को तोहि दियऊ ॥ कहा नृप सतनाम कबीरा । सो हमरे रक्षक गुरुपरा ॥ सो समर्थ मम सङ्कट निवारन । औ सब जीवके विथा विडारन ॥ तब कबीर निज रूप दिखावा । नारद प्रतीत भये पतिआवा ॥ नारद सुनहु श्रवण दे वैना । कहै कबीर अलख लख नेना ॥ कस तुम फंद रच्यो इहँ आई । भेटो अजहूँ सबै नसई ॥ डोप तोहे नरक लै नारद । राख सके को गनपत शारद ॥ नारद बेग नृपके पग धारे । राजा बकसहु चूक हमारे ॥