कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
११
अब निज इच्छा भये है मोरा । सतगुरु करो कबीर बंदीछोरा ॥ केहि कारण हमहूं दुख पावा । निरंजन मोहि भग जठर रमावा ॥ जन्म मरण औ गर्भ वसेरा । कोटिन वार धरो तन फेरा ॥ जब कबीरको लेउं प्रवाना । तब मैं करिहों लोक पयाना ॥ जन्म मरण तब छूटे भाई । सतकबीर जब हृदय समाई ॥
व्यास सुखदेव गुरु उवाच ।
कहैं व्यास सुखदेव गुरु आदी । हम सब तुम्हरे सेवक आदी ॥ आप तार हमहूं कहैं तारो । जन्म मरण हर मोर निश्चारो ॥ तुम थोरे घर दस चौबीसा । इतन दुख हर धूनहु सीसा ॥ कहैं सुखदेव मैं परकं चौरासी । नामभक्त विन परे जमफांसी ॥ सही निर्गुण विन मुक्ति न होई । को हम सम तप करि है लोई ॥ सो तो हर चौरासी डारेहु । भक्तनकेर वाट तुम पारेहु ॥
विष्णु उवाच ।
कहैं विष्णु मैं करो का भाई । निराकार जैसे फरभाई ॥ पाप पुण्य कछु नहि जानो । पितु आज्ञा मैं सिरपर मानो ॥ नहि मानो तो मोहिं धर खाई । काह कहौं कछु कहत न जाई ॥ पिता निरंजन बड हर भोगा । दुखित सबे हिंहु पुरके लोगा ॥ जन्म मरण सब कोइ अरुझा । बांचे सतकबीर जेहि सूझा ॥ सतकबीर जेहि होय सहाई । ताके वारन बंके भाई ॥ पाछे रामचंद्र मैं रहकं । पितु आज्ञाते जन्म लियकं ॥ धन मम तिरिती निरंजन काळा । सबहिं खाय सुतकरे विहाळा ॥ कर व्याह बन पठहन मोही । पुन बन विपत दीन्ह बहु झोही ॥