भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कविरत्नकल्पगीता ।

१३

जब हत्या छूटे हरि केरा । निहकलंक औतार साधु वस चैरा चारों जुग आयेंउं कइ वारा । जुग जुग२ आय धरैव औतारा॥ मैं तो बोइल देव पितु पाहीं । मैं कस न बोइल जीवपै चाहौ ॥ बोइल न छूटे कोट उपाई । कोट अनेक जिन सांसत पाई ॥ जो मैं करों सो पिताके आज्ञा । तापर श्रेष्ठ सो सद्गुरुसंगा ॥ सद्गुरुके संग कपे काला । सद्गुरु सत्तकवीर दयाल्ला ॥ कर्म भोग फल सब जिव पावे । कयों नहिं सुखकी राह चलावे ॥ वेद शास्त्र सब तनका वाणी । करने चले वाट पहिचानी ॥ चित सोई जो पर उपकारी । नार सोई पिव दरश अघारी ॥ सोई शिष्य गुरु शब्द जो माने । सोई पुत्र पितु सेवा ठाने ॥ सोई बहु जो सास सहेली । खसम सहेली सो बेलि चमेली ॥ पुत्री मातसे दुतिया वाणी । तम फल बीज जो बोवे प्राणी ॥ औरहिं देय जो भोजन करहीं । सो प्राणी वैकुंठे तरहीं ॥ भूखे अन्न प्योसेको पानी । नांगे वस्तर देय सुखखानी ॥ सुखी सोई जो पर तन पोषे । आनहिं वंचित पावे सोइ मोषे ॥ कोट जग्य पुण्य फल पावे । कसाई सो जो गाय छोडावे ॥ काहु जीव सो द्रोह न करई । जीवद्रोह कर नकें परही ॥ भूखा विष्णु अन्नजेवावे । गऊ कोट मुक्त फल पावे ॥ सकल देह व्यापे सतनामा । रमता राम सकल विश्रामा ॥ विष्णु बडे भागते होई । विष्णुपंथविन तरे न कोई ॥ इह बांधो सतभक्त कबीर । औ जस खेती पान शरीरा ॥