कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
( ३७ )
स्वासा पूंजी सवके भाई । सो स्वासा कवीर निरमाई ॥ स्वासा देह लिये संगे चले । निकसत स्वासा देह महि मिले ॥ देहीं त्रिगुण राय निरंजन । स्वासा अंस कवीर दुख भंजन ॥ स्वासा आद पवन है भाई । नासिका वाट सो आवहिं जाई ॥ नासिका निकट सो दरसे आतम । आतम दरस दरसे परमातम ॥ छचीस नीर और पवन पचासी । ताते न्यारा सोहंग अविनासी ॥ सोहंग जीव सुखसागर केरा । तन धर भुगते दुःख घनेरा ॥ केदली ब्रह्मके नाम सोहंगा । जाको मूल सो शब्द विहंगा ॥ जीवके नाम केदल ब्रह्म कहिये । विहंग प्रचै कवीर मिल छहिये ॥ रोरा नल कुमत अठ गांठी । गुरुके ज्ञानन भिमके साठी ॥ दोहा—अजुर्न भीम सकल मिला, कीन्ह कवीर प्रणाम ॥ सतकवीर जीवरक्षक, जै २ कवीर सतनाम ॥
निरंजन दरवारकर दूता । पाती ले आव अवधूता ॥ विष्णुहिं धाय पाती तिन दान्हा । विष्णु वांच विहसे प्रवीना ॥ फुरमाई राजाके आई । विष्णु वांचके सबहिं सुनाई ॥ पत्री निकसा चाहिय जलपाना । पुण्यमान औ जिव बलवाना ॥ भीमसु तबहीं भीमकहैं हेरा । दूत धाय गल गहा भीमकेरा ॥ घैचेउ लट पाछे करि आना । सुरक बांध ले कीन्ह पयाना ॥ भीमको अकल सबहीं भूला । मूसहिंले मंजार जस झूला ॥ कहैं कृष्ण सुन भीम हठीला । कहाँ गयो बलरंग भयो ठीला ॥ कहैं कृष्ण सुन भीम गहीरा । गाढ रक्षक सत्कवीरा ॥