भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरुष्णगीता ।

३९

सत्यकवीर संसार तेहि दीन्हा । जै जै सत्यकवीर प्रवीना ॥ जै जै अकह सो नाम कवीरा । पुष्पवास घृत घ्राण शरीरा ॥ जै जै रुपाळ कवीर गोसाईं । गऊ कपिलहिं ले यमते छुडाईं ॥ जै जै अयर नाम कवीरा । लखा घर जरत खंभ मई चौरा ॥ थाके भीम खंभ नहि आना । वाचा वंध व्याकुल भगवाना ॥ तवहीं रुष्ण कवीर पुकारा । जै पतालते खंभ उखारा ॥ जै जै कहि बहु बार कवीरा । जै राम लक्ष्मण एक शरीरा ॥ जै भरथ शत्रुघन सीता सती । जै दशरथ दायो सो क्रांती ॥ जै कवीर अमोलख भाई । जै पुष्पवास प्रति रहे समाई ॥ जै काया दल वीर कवीरा । जै अधर धजा फहरात शरीरा ॥ जै एक स्वास बहु मूंदे आंखी । भीतर सबके कवीर सुतसाखी ॥ आप आप मन ध्यान औराधे । दसों द्वार मन पवन कस बांधे ॥ प्रेम भक्त बस साहेब सोईं । माया चहे सो प्रभु नहिं होईं ॥ सत्कवीर आप निरमाया । आप न्यारा माया जग छाया ॥ माया बस पर जीव कहावे । निहमाया सतकवीर रहावे ॥ जहां अस्मिमान कपट चतुराईं । तेहि नहिं सत्यकवीर दरसाईं ॥ तन मन धन जोवन बन फूला । मन भौरा ताके रस भूला ॥ जब वन्सपती बन गई सुखाईं । भौरहि भूख लाग अधिकाईं ॥ जेहि बन देखत भौर सुलाना । तेहि बन वरस अंगार सयाना ॥ तब भौरा सरवर दिशि धांसा । पुरइन कंबल जाय अलवासा ॥ कहे कंबल भौरा वनवासी । विपत परेउ आयउ मम पासी ॥