कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥ अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥ चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥ मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥ गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥ एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥ पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥ जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥ चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥ नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥ तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥ मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥ निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥ एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥ सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥ बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥ कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥ कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥