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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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प्रस्तावना.

गाथा इत्यादियोंका उपरोक्त उद्देश्यकी सिद्धिके लिये आविर्भाव हुआ है।

उसी प्रकारसे कवीरपन्थी महात्माओंने उपरोक्त आशयकी सिद्धिके लियेही अनेक ग्रन्थोंकी रचना की है। उन्हींमेंसे यह कवीर-कृष्णगीता भी एक है।

यद्यपि क्षुद्र विचारवाले, पक्षपातपूर्ण कुतर्कियोंको इस ग्रन्थमें सारका दर्शन मिलना कठिनही-नहीं असम्भवभी-है, तथापि जो सत्यके खोजी हैं, निज आत्माके कल्याणकी जिनको तीव्र इच्छा है, जो सारग्राही और पक्षपातशून्य हैं, उन्हें इस ग्रन्थके प्रत्येक शब्दों, वाक्यों चौपाइयोंमें यथायतस्वका दर्शन हुए बिना कदापि नहीं रहेगा।

इस ग्रन्थकी एकही प्रति मेरे पास रहनेसे मुझे स्वतंत्रतासे इसकी शुद्धि अशुद्धिपर विचार करनेका अवकाश न मिलनेसे, निज नियमा-नुसार इस आवृत्तिमें हस्तलिखित प्रतिको ज्योंका त्यों छपवा दिया है। यदि इसकी और प्रतियाँ मिल जायँगी अथवा जो कोई इस ग्रन्थकी हस्त लिखित प्रति मेरे पास भेज देंगे, दूसरी आवृत्तिमें उन सब ग्रन्थोंद्वारा इसको शुद्ध करके छपवानेका प्रबन्ध किया जायगा-साथही उन ग्रन्थ भेजनेवालोंका नाम प्रस्तावनामें दे दिया जायगा और ग्रन्थ छप जानेपर छपी हुई एक प्रतिभी उन्हें दी जायगी। यह ग्रन्थ जिस प्रतिसे छपा गया है, वह प्रति छत्तीसगढ़के एक पनिका महंत दरबनदासकी दी हुई प्रतिके ऊपरसे लिखी गयी थी।

कितने लोगोंको, जिन्हें यह ज्ञान है कि-शुभस्थान कबीरधर्मनगरमेंभी छापाखाना खुल चुका है और वहाँभी ग्रन्थ छपते हैं, तब निजके प्रेसको छोड़कर बम्बईमें यह ग्रन्थ क्यों छपवाया गया है, ऐसे लोगोंको जानना चाहिये कि-शुभस्थान “कबीरधर्मनगर” दिहातमें होनेके कारण वहाँ एक तो प्रेसके लिये उपयुक्त कम्पोजिटर, कागज, स्याही इत्यादि कुल वस्तुओंपर अत्यन्त खर्च पड़ता है। दूसरे हैण्ड प्रेस होनेके कारण उस प्रेससे कामभी बहुत कम निकलता है, इस हेतु ग्रन्थोंका शीघ्र शीघ्र यहाँके प्रेस (कबीरधर्मप्रकाश) से छपना दुरतर-समझकर, और लोगोंकी, ग्रन्थोंके लिये मांग अधिक बढ़ जानेके कारण सिद्धि श्री १०८ पं० श्री उग्रनामसाहब प्रधान