कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1031, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं जान पड़ती । केवल अपने २ आचार्य (नबी) का नाम ले लेकर धूम मचाते हैं । इसी प्रकार संसारभरके मतबादियों पक्षपातियों और विषयियोंकी दशा हो रही है ।
मनुष्यको उचित है कि, गुरुसे अधीन रहे सर्वदा उसकी आज्ञाका पालन करे पूरी प्रतिष्ठासे गुरुके सन्मुख रहे कभी ऊँचे शब्दसे बेअदबोंके समान धूण्टता प्रकट न करे गुरुसे अभिमान करनेपर अन्तःरण मैला हो जायगा ।
स्वसंवेदका सार— स्वसंवेदका संक्षेपमें सारांश केवल एक सार शब्द है । वह कहने सुननेमें नहीं आता, केवल सत्यगुरुकी कृपासे अपने विचार द्वाराही जाना जाता है । लोगोंको समझानेके लिये सारशब्द कहा जाता है । सार नाम है यथार्थ भेदका और शब्द नाम वाणीका है । शब्दका जो यथार्थ लक्ष्य हो उसे सार शब्द कहते हैं । उसको जो पहचाने वह हंस है वही मुक्त है । सारशब्दकी व्याख्यामें कबीर साहबने चौदह अरब ज्ञान कहे हैं । क्योंकि, सारशब्द बोली भाषामें नहीं आता, उपदेश सुनते २ विचार करते २ भाग्यवान्के समझमें आ जाता है । चारों युगोंसे कबीर साहब समझाते आये हैं अनन्त ग्रन्थ बर्णन किये हैं, जो कि स्वसंवेदके नामसे प्रसिद्ध हैं । वे सब केवल सारशब्दकी टीका हैं । जब सत्यपुरुषकी उत्पत्तिकी इच्छा हुई सूक्ष्मसे स्थूल हुआ । तब शून्यमें एक झाँई दृष्टि पड़ी, वही बिन्दीके आकारमें खड़ी हुई (०) ॥
बिन्दी— जब सारशब्द सूक्ष्मसे स्थूल हुआ बिन्दीरूप झाँई प्रगट हुई, उसीसे सब सृष्टि उत्पन्न हो गई । समस्त संसारमें यह बिन्दी है केवल उसी एक बिन्दीसे सब संसार है । देखो गयासुल्लोग्रातमें यह लिखा है, कि, समस्त संसारमें यह नुक्ता फँल गया । इसको अनुस्वार कहते हैं, इसका दूसरा नाम मकार भी है, इसी मकारको 'माया कहते हैं । इस मायाके मिथ्या, कपट, छल, शून्य, भ्रम, शक्ति और प्रकृति आदिके बहुत नाम हैं । मायाके अनन्त नाम हैं, वे सब केवल इस बिन्दीकी ही प्रशंसामें हैं सभी भ्रम हैं, इसी बिन्दीसे सब भ्रम हैं एक भी सत्य नहीं है ।
जब लेखनी कागद पर रखकर कुछ लिखना चाहते हैं, तो पहले बिन्दी बनती है, फिर उसीके पेटसे सब अक्षर निकलते हैं । यह सम्भव नहीं कि, कागद-पर लेखनी रखें बिन्दी न बने । अवश्य पहले विवश बिन्दी बनेगी फिर पीछे अक्षर, अक्षरसे शब्द शब्दसे लेख, फिर भाषा बनेगी । इस कारण लिखने
१ आदि मंगलके अर्थमें साकेतवासी श्रीविश्वनाथजीने सारा विस्तार बताया है किन्तु यहाँ मूका सारा पसार दिखाया है विज्ञान दोनों बातोंका विचार करें एवं सुधार कर पढ़ें ।