कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1065, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंदया करके पांच सात तोतोंको उनकी रक्षाके लिये उनका पालन किया । उनको यह सिखलाया कि, तुम शिकारीको पहचान लिया करो । जो जालके ऊपर दाना बिखेरता है उसके नीचे जालको देख लेना । जो नलकी लगाता है, उसके नीचे पानी रख देता है, उसके ऊपर तुम न बैठना, सावधान रहना । यदि संयोग नलकीके ऊपर बैठ भी जाओ तो जब नीचे लटक जाओ तब अपना पञ्जा नलकीसे छोड़ देना । वह नलकी तुमको नहीं पकड़ सकती । वह पानी जो तुम्हारे नीचे देख पड़ता है वह तुमको डुबा नहीं सकेगा, उनको देखकर कुछ भय न करना, नलकीको छोड़कर उड़ जाना, तब तुम शिकारीके हाथसे बच जाओगे । यह सब बातें सिखलाकर साधूने उन तोतोंको छोड़ दिया । वे वृक्षोंपर बैठ गये, जो कुछ साधूने सिखलाया था वही पुकार २ बोलने लगे । उनका शब्द सुनकर जड़ली तोते सचेत थे सावधान होकर चिड़ी मारके जालसे बच गये वे न नलकी पर बैठे न जालहीमें फँसे, सावधान होकर सबके सब बच गये । जो तोते बे समझ और निर्बुद्धि थे, उन्होंने केवल पढ़ लिया था पर उनमें बुद्धिकी कुछ गन्ध नहीं थी नलकीमें फँसे शिकारीने पकड़ लिया ।
समन्वय—इसी प्रकार सभी विद्याभिमानी तोतोंके समान कालपुरुषके फन्देमें फँसे वासनामें बन्द हुये । उनके वचनोंको सुनकर अनपढ़ लोग बच गये पर वे न बचे । ऐसे विद्याभिमानी सँकड़ों उपाय करें सन्तोंकी सहायता और कृपाके बिना कभी भी न छूटेंगे । वह अधिकसे अधिकमहामायाके स्थानतक पहुँच सकते हैं, आगे उनको कदापि मालूम न होगा । वे क्या जाने कि, ईश्वर कौन है ? उनको परमात्माने यह विवेकही नहीं प्रदान किया, उनको कुछ भी सुधि नहीं कि, एक क्या है और अनन्त क्या है ? ईश्वरकी भक्ति क्या है ? जगत्की भक्ति क्या है ? किस प्रकार होती है ?
इसी महामायाके सब नाम रूप हैं, सब मिथ्या और भ्रममात्र हैं, विद्याभिमानी केवल पुस्तकोंही द्वारा शुद्ध चैतन्य ब्रह्मको जानना चाहते हैं, यह बात नितान्त असम्भव है ।
विद्याभिमानी जनोंको पता नहीं—मायाका नाम जड़ है जब तक इन लोगोंने जड़को अपना गुरु मान रखा है तब तक उनकी बुद्धि भी जड़ रहेगी वे कभी ईश्वरीय ज्ञानके पात्र न होंगे । जब उनको सन्त और गुरु मिलेंगे अधीनताके साथ उनकी शिक्षा स्वीकार करेंगे, तब उन्हें मनुष्यता आवेगी । आत्मज्ञान तथा ईश्वरीय ज्ञानके अधिकारी होंगे । सब विद्याभिमानी अन्धोंके समान टटोलते फिरते हैं, कुछ पता नहीं पाते कि, सच्ची बात क्या है ?