भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1087

साधुको ढूंढना आरम्भ किया उधर राजाने साधुके लिये उत्तम २ भोजन बनावेकी आज्ञा दी । सेवक लोग साधुको बुलाकर ले आये भोजन करनेके लिये बैठाय। साधुको हाथही पर खानेका अभ्यास था, राजाके रसोइयोंने ऐसी गरम २ वस्तु उसके हाथपर रखदी कि, जिससे उनका हाथ जल गया । जिस समय वह साधु भोजन करके राजमहलसे बाहर निकला उसी समय आकाशसे आगकी वृष्टि हुई राजाका समस्त राजमहल जलकर भस्म हो गया । इसमें विचार करनेकी बात है कि, उस दरिद्र दुखियेने प्रेम, शुद्ध अन्तःकरण और सच्ची भाव भक्तिसे साधुको भोजन कराया था, उसको किसी प्रकारकी लौकिक कामना न थी । केवल अपना धर्म जानकर उसने भोजन कराया था । राजाने जो कुछ किया सो सच्चे भाव भक्तिके बिना सांसारिक लोभमें पड़कर किया इस कारण दोनोंको फल मिला, वो प्रत्यक्ष है । जो कोई भाव भक्ति सहित भी सांसारिक लोभसे साधु सेवा करता है उसको बहुत थोड़ा फल मिलता है । जो कोई भाव भक्ति बिना कुछ माहात्म्य देख सुनकर, किसी प्रकारकी कामनासे, सेवा करता है उसका फल ठीक उलटा होता है, जैसा कि, राजाको हुवा ॥

रोटी देनेसे हजरत ईसाका भी शाप चला गया—किसी मुसलमानी किताबमें मैंने पढ़ा था कि हजरत ईसा फिरते फिरते एक गाँवमें पहुँचे । उस गाँवके सब लोग उनके पास जमा हो कहने लगे कि, हजरत इस गाँवमें एक धोबी रहता है वह बड़ा दुष्ट है, गाँवभरके लोगोंको बहुत दुख देता है, किसीका कपड़ा फाड़ लेता है, किसीका चुराही लेता है, किसीका बदलाही लेता है, लोग उससे अत्यन्त दुःखी हैं गाँवके लोगोंकी यह बात सुनकर हजरतके मुखसे यह बात निकल गई कि, वह धोबी घाटसे जीवित न आवेगा, वहाँही मर जावेगा । उधर धोबीके भोजन करनेका समय हुआ, तब उसके तीन रोटी गई । धोबीने हाथ, पैर धोकर रोटी खाना चाहा । इतनेहीमें एक फकीर आकर खड़ा हुआ, खानेको माँगने लगा । धोबीको दया आगई उसने एक रोटी उठाकर फकीरको दे दी । उस फकीरने रोटी खाकर आशीर्वाद दिया कि, तेरा अन्तःकरण शुद्ध होजा । धोबीने दूसरी रोटी भी फकीरको दे दी, उस फकीरने रोटी लेकर कहा कि, तुझे ईश्वर अचानककी आपत्तियोंसे बचावे फिर धोबीने तीसरी रोटी भी देदी, तो फकीरने आशीर्वाद दिया कि, खुदा तुझे स्वर्गमें एक कोठरी दे । ये तीनों बात कहकर वह फकीर तो चला गया । सन्ध्या होते ही धोबी अपने घर आया । उसे घर आया देख सब लोग हजरत ईसाके पास जाकर कहने लगे कि, या हजरत ! यह धोबी तो सही सलामत जीता जागता घरको आया, आपके वचन