भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1093

कबीर – एक दिना नहिं करिसके, दूजे दिन करि लेहि ।

सद्गुरु दरशनके किये, पावे उत्तम देहि ॥

कबीर – दूजे दिन ना करि सके, चौथे दिन कर जाय ।

सद्गुरु दरशनके किये, मोक्ष मूक्ति फल पाय ॥

कबीर – बार बार ना करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।

कहैं कबीर ता दासका, जन्म सुफलही होय ॥

कबीर – पक्षे पक्ष ना करि सके, मास मास कर धाय ।

यामें भेद न कीजिये, कहैं कबीर समझाय ॥

कबीर – मास मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।

यामें ढील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत्त ॥

कबीर – छठे मास ना करि सके, बरस दिना करि लेहि ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥

कबीर – बरष बरष नाकरि सके, ताको लागे दोष ।

कहैं कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष ॥

कबीर – माता पिता सुत स्त्री, बन्धु कुटुम्बको जान ।

गुरु दरशनको जब चले, ये अटकावे आन ॥

कबीर – उनका अटका ना रहे, गुरु दरशनकी जाय ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥

कबीर – खाली साधु न विदाकर, सुनि लीजे सब कोय ।

कहैं कबीरा भेंट धर, जो तेरे घर होय ॥

कबीर – मुहर रुपया पैसा, कपड़ा बासन देइ ।

कहैं कबीर सो जगतमें, जन्म सुफल करि लेइ ॥

कबीर – निराकार निज रूप है, प्रेम प्रीतिसे सेव ।

जो चाहे आकारको, साधू प्रत्यक्ष देव ॥

कबीर – जा सुखको मुनिवर रमे, सुर नर करें मिलाप ।

सो सुख सहजें पाइये, सन्तों सङ्गति आप ॥

कबीर – कोटि कोटि तीरथ करे, कोटि कोटि करे धाम ।

जब लगि सन्त न सेवई, तब लगि सरे न काम ॥

कबीर – आशा बासा सन्तका, ब्रह्मा लखे न वेद ।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावे भेद ॥