भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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में प्रसन्न रहूँगा। जो ब्राह्मणको दुःखी करेगा उससे मैं दुःखी होऊँगा। विष्णुसे यह बात सुनकर ब्रह्मा अति प्रसन्न हुए, और उन्हें निश्चय हो गया कि, अब हमारी संतान सुख पावेगी तथा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगी।

इस प्रकार तीनों भाई अपनी स्त्रियों सहित रहने और आनंद करने लगे। स्वयम् निरञ्जन तो शून्यमें जाकर शून्यस्वरूप होगये और तीनोंलोकोंका राज्य तथा शासन अपनी स्त्री अद्या और तीनों पुत्रों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) को सौंप दिया बस ए ही चारों समस्त संसारके मालिक हैं।

चालीसवाँ प्रकरण

मायासृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त।

इसके पहले मैं ब्रह्मसृष्टि और जीवसृष्टिका वर्णन कर आया हूँ, अब यहाँ से मायासृष्टिका विवरण करता हूँ —

मायासृष्टिका ऋष्टा स्वामी निरञ्जन है और इस मायासृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश सब कुछ कालपुरुष द्वारा हुआ करता है। ब्रह्म और जीव-सृष्टिका कभी विनाश नहीं होता, पर मायासृष्टिको इन्द्रजालियोंके सदृश काल-पुरुष उत्पन्न करता है और फिर समेट लेता है। जैसे भानमतीकी पेटारीमेंसे सब सामान निलकते फिर उसीमें समाजाते हैं, यही अवस्था उत्पत्ति तथा प्रलयकी है। इस मायासृष्टिका सदैव विनाश होता है और जन्म मरणका सब दुःख और सुख इसीमें है निरञ्जने जब मायासृष्टि रची, तब प्रथम कर्मका जाल बनाया। स्वर्गकी रचना की, भयानक तथा रौचक सब इस मायासृष्टिके निमित्त ठहराया और पिता पुत्र अर्थात् निरंजन और विष्णु राज्य करने लगे। निर्गुण तथा सगुण अर्थात् निर्गुण निरञ्जन जो परमेश्वर वा खुदा कहलाता है और सगुण विष्णु राम, कृष्ण इत्यादि सशरीर अवतारधारी परमेश्वरकी पूजा सारे संसारमें होनेलगी। निर्गुणको योगीलोग योग समाधि द्वारा पाते हैं और सगुण विष्णुको समस्त हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और मूमाई पूजन करते हैं यह मायासृष्टि सदैव बंधनमें रहती है उसका छूटना महा कठिन है।

इकतालीसवाँ प्रकरण

मायासृष्टिका विवरण।

अद्या, ब्रह्मा, विष्णु और महेशने चार खान चौरासी लाख योनिकी