भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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तीन देव प्रत्यक्ष तोड़े, करे किसकी सेव ॥
पाथर गढ़के मूरति कीनी, धरिक्छे छाती लात ।
जो वह मूरति साँची होती, गढ़नहारको खात ॥
भाँति बहुत और लापसी, करि करि पूजा सार ।
भोगन हारा भोगिया, मूरतिके मुख छार ॥
पाती तोड़े मालिनी, और पाती पाती जीव ।
जा पाहनको पाती तोड़े, सो पाहन निर्जीव ॥
मालिन भूली जगत् भुलाना, हम भुलावे नाहिं ।
कहें कवीर हम राम राखे, कृपा करि हरि राय ॥

जबतक जीव पांचों अहंकारोंको न छोड़ेगा तबतक कल्याण न होगा, अहंकारही सब कर्मोंका मूल एवं बन्धनका कारण हैं। जिसने अहंकार छोड़ा वह उभय लोकमें सुखी हुआ। निरहंकारी पुरुष कभी मूर्खोंकी संगति स्वीकार नहीं करता, क्योंकि, मूर्खलोग मिथ्या अहंकारमें पड़े पक्षापक्षमें फँसे होते हैं। पक्षापाती और अहंकारी तथा धर्मद्वेषियों की संगतिसे सत्यगुरु नहीं प्राप्त होते बरन् निर्पक्ष, सत्याचारी, सद्गुणसम्पन्न विद्वानोंकी संगतिसे सत्यगुरु प्राप्त होते हैं।

हे अधिकारी जनो ! नम्रता धारणकर सबके साथ प्रेमहीका बरताव करो, दीन दुखियोंको तुच्छ न समझो। क्योंकि, सत्यगुरु इन्हीं लोगोंपर प्रसन्न होता है उन्हींके स्वरूपमें वन्दीछोर मिलता है। अहं त्वमें पड़कर अपने यथार्थको हाथसे मत खोओ। शरीरके अभिमानमें न पड़ो।

सारा संसार अनित्य है, अनित्यका सब खेल है, देहाभिमानमें पड़ना अज्ञानता और मूर्खताके सिवा दूसरा क्या है ? इसीको अविद्या सागर कहते हैं। देहाभिमानी कभी सुख नहीं पाता, सर्वदा दुख सागरमें गोता खाया करता है। यद्यपि यह मनुष्यशरीर सर्वोत्कृष्ट है, पर इसके अभिमानमें पड़कर इसीके पोषण पालनमें रहनेके लिये नहीं किन्तु आत्मविचार कर सत्यपदको प्राप्त करनेके लियेही श्रेष्ठता है। यदि मनुष्य शरीर पाकर आत्मविचार न हुआ तो इससे बढ़कर नीच और तुच्छ कोई भी नहीं। क्योंकि, दूसरे शरीरोंमें पड़ा हुआ जीव स्वप्न सुषुप्ति अवस्था के कारण स्वाभाविक ही अविद्याके वशमें पड़ा होता है। केवल मनुष्य शरीर पाकर जीव जाग्रत अवस्था पर अधिकृत होता है। इसमें भी जाग्रत नहीं हुआ यानी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया तो पशुसे भी तुच्छ हुआ। देहाभिमानमें पड़ा हुआ जीव सदा काल फाँसमें पड़ा रहता है, जबतक देहाभिमान न छोड़ेगा तबतक सुखका दर्शन भी न होगा। यदि लोक परलोककी सर्व सामग्री और सुख प्राप्त हो