भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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हैं और तमोगुणी नरकमें रहते हैं । संत सतोगुणी, सांसारिक मनुष्य रजोगुणी और विद्याभिमानी, देहाभिमानी पक्षपाती सभी तमोगुणी हैं ।

यद्यपि विद्याभिमानी तथा देहाभिमानियोंमेंसे भी कितनेक शुभ कर्ममें प्रवृत्त होते हैं पर केवल राजभय अथवा लोकभयसे । जो सतोगुणी विद्वान् हैं, वे लोक परलोकके भय अथवा शारीरिक अपमानके कारण नहीं बरन् अपने अंतरीय प्रकाश और ज्ञानसे करते हैं । वे संसारको तुच्छ जानते हैं तो भी विद्वान् और सच्चे विचारवानोंके सामने उनका कार्य माननीय और प्रशंसनीय होता है ।

भारतीय मत ।

सबसे प्रथम धर्म (मजहबों) के स्थापित करनेवाले भारतवर्षकेही ऋषि मुनि और महात्मा हुये हैं । भजन, भक्ति, ज्ञान, तथा पारलौकिक मार्गके पथ-दर्शकोंमें सबसे बढ़कर श्रेष्ठ उच्चपद भारतवासियोंका ही है । इस कारण प्रथम हिन्दू धर्मके ऊपरही कुछ लिखता हूँ ।

सहस्रों, ऋषि, मुनि, सिद्ध, साधुओंने भारतवर्षमें नाना प्रकारके मत मतांतर प्रचलित किये । षट् दर्शन छ्चानवे पाखण्ड हुए । इसी देशसे नाना सिद्धांतों को लिये हुये सहस्रों धर्म (मजहब) दूसरे देशोंमें फैले, इन्हीं (भारतवासियों) केही धम्मों और रीतिओंकी अन्य देशके पैगम्बरों और आचार्योंने नक़ल करके अपना २ धर्म स्थापित किया ।

सृष्टिकी आदिमें मनुष्य शुद्ध, छल कपटसे रहित देवतोंके समान होते हैं पाप पुण्य उनकी दृष्टिमें कुछ होताही नहीं स्वभावमेंही स्थित होते हैं । क्रमशः राग द्वेष बढ़कर लोगोंका अंतःकरण अशुद्ध होने लगता है इसीलिये मजहबकों आवश्यकता होती है; भजन, भक्ति, तप आदिकी रीति स्थापित होती है । इसी ढंग पर संसार चलता रहता है । ब्रह्माण्डमें एकही वेद अनेक रूप होकर संसारमें फैलता है । संसारके मनुष्य वेदकी ही आज्ञापर चलते हैं । अपने २ विचार और धर्मके अनुसार वेदके प्रमाण लेकर उसको पुष्ट करते हैं ।

कबीर साहिबका सत्यशब्द टकसारका शब्द ।

संतो दुविधा कहांते आई ॥

नाना भांति विचार करत है कौने मति बौराई ॥

तुरिया रूप ॥

ऋगु कहे निराकार निरलिप्ती अगम अगोचर साई ॥

आवे न जाय मरे नहिं जीवे रूप बरण कछु नाहीं ॥