कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1173, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाती लोग अपना अभीष्ट सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारकी युक्ति और प्रमाणों के आग्रहसे अपनी सत्यता प्रगट करते हैं ।
यह साधारण नियम है कि, जो जिसका पक्षपाती होता है वह अपनी आशक्तिके कारण उसके अवगुणोंको भी गुण करकेही जानता है । जैसे अपना मुंह आपसे नहीं देखा जाता वरन् दृश्यसेही देखा जाता है । अथवा जैसे कोई ऊँचे स्थानपर चढ़े बिना नीचेके सब पदार्थोंको भली प्रकार नहीं देख सकता । उसी प्रकार जबतक निरपेक्ष होकर किसी मतको नहीं देखेगा, तबतक उसके गुण अवगुणोंको नहीं जान सकेगा ।
योगियोंका मत ।
वेदहीसे योग समाधि तथा षट् दर्शन निकले माने जाते हैं । योगियोंको योग पमाधिका बड़ा अभिमान है । योगसे वे अपनेको अमर समझते हैं ।
भोगी योगीकी समता ।
भ्रममें पड़कर वे अपनेको कृतार्थ समझते हैं पर यह नहीं समझते कि, जैसा भोग बैसाही योग भी है । दोनों निर्मूल और तुच्छ हैं । योगी नादकेद्वारा ऊपरको चढ़ता है, भोगी बिन्दुके द्वारा नीचे आता है । अतः—
आधारचक्रो भेद—योगी अपान वायुके द्वारा गणेश क्रिया करता है । आधार चक्रको साधता है अर्थात्—गुदा द्वारसे जल खींचकर ऊपर चढ़ाता है फिर गिरा देता है, फिर चढ़ाता और गिराता है । ऐसेही बारंबार करनेसे आधार चक्र टूट जाता है और उससे योगी ऊपरको चलता है तब आधार चक्र सिद्ध कहलाता है ।
छः चक्रोंमें यह प्रथम चक्र है ।
स्वाधिष्ठान चक्र भेद—आधार चक्रके ऊपर स्वाधिष्ठान चक्र है । जब आधार चक्र सिद्ध होजाता है तब स्वाधिष्ठान चक्र भेदनेकी चिंता बढ़ती है इसके लिये युक्ति करता है । बारह अंगुलकी सलाका बनाकर लिङ्ग द्वारमें उसे बार बार चलाता है, जिससे उपस्थेन्द्रियका छिद्र शुद्ध और साफ हो जाता है । फिर उपस्थ इन्द्रियसे जल खींचकर चढ़ाता है । जल अच्छी तरह चढ़ाने और उतारनेका अभ्यास पड़ जाता है । तब क्रमशः दूध और मधुको चढ़ाता है । जब मधुके चढ़ाने उतारनेका अभ्यास पूरा हो जाता है तो स्वाधिष्ठान चक्र सिद्ध होता है । फिर योगी आगेको बढ़ता है ।
यह क्रिया, प्रायः वाममागी और अघोरी तथा गुसाई ब्रह्मचारी नामके भेषधारी अन्य विषयी लोग साधते हैं ।
मणिपूरक चक्र भेद—फिर योग अपान और समान वायुका सम्मिलन