कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1179, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीर तीर्थकर जैनके, चौबीसो भये मोख ।
मुक्ति कहै पुदगल छुटे, ग्रंथ कियो किमि चोख ॥ ८ ॥
मुक्ति भई तेहि जैनकी, चौबीस आदिक और ।
पुदगल उनकी छुट गई, बचन कहा केहि ठौर ॥ ९ ॥
रिषभ आदि जेहि बन रहै, तेहि बन लागी आगि ।
घेरेमें जब जरि मुये, दोष अठारह त्यागि ॥ १० ॥
जीभि कमान वचन शर, पनच श्रवण लगि तान ।
रिषभदेवसे धनुषधर, मान्यो यह षट बान ॥ ११ ॥
याहे छौ बानके लागते, जैनी भया अचेत ।
लागी मूच्छर्छा कर्मकी, दुःख भोगे सुख हेत ॥ १२ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, साधन जुत्ती खाय ।
दोष अठारह चोरपर, षट मुख भूकै धाय ॥ १३ ॥
काली बिल्ली रिषभकी, खट पकवान बनाइ ।
आय यति होई जैन घर, भोजन कछुवो न खाइ ॥ १४ ॥
कबीर जैनीके हिये, बिल्लीकी इतवार ।
साधन व्यंजन मोक्षहित, सौपेउ तेहि भण्डार ॥ १५ ॥
काली कुत्ती रिषभकी, अनादि दन्त षट चोख ।
साधन बर्नहि खदेडिकै, मारै सावज मोख ॥ १६ ॥
कबीर वाणी रिषभकी, राणी भइ सरदार ।
जैनिके शिर मारिया, साधन दुःख पैजार ॥ १७ ॥
कबीर चोरवा जैन घर, मान्यो साधन सेंधि ।
सुख धन मूस्यो तिनहिको, रहा सकल दुःख बेधि ॥ १८ ॥
रिषभ आदि जेते जिन, अव्याकृत गुण मूल ।
जिन षट द्रव्य बुझाइया, है सोइ कारण मूल ॥ १९ ॥
कबीर जो पै मुक्ति होई, छुधा पिपासा छोड़ि ।
तौ काहैं अहार देइ, जैनिक मइया भोड़ि ॥ २० ॥
कबीर जैनिक माइया, जैने धर्म कमाय ।
साधन गुण जानत रही, तो काहे दूध पिलाय ॥ २१ ॥
वेश्या औ जैन यति, दो पथ एके आहि ।
मोल खरीद वेश्या सती, यति सों मोल विसाहि ॥ २२ ॥
मोल खरीद मुड़िया करे, मुये मुक्ति मोकाम ।