कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1182, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं एकही दोनों न कं उनमें आजिज । कोई विष्णुको पूजे कोई दिलदार मसीहा ॥
यह धर्म सारी पृथ्वीपर प्रचलित है । पादरी लोग सब देशों, शहरों, गावोंमें फिर २ कर उपदेश दिया करते हैं । इसमें किसी प्रकारका कोई ऐसा धार्मिक नियम नहीं है जिसके कि, करनेमें इस धर्मवालोंको कुछ कठिनता जान पड़े । रोज़ा नमाज़, पूजा, पाठ, कोई भी ऐसा नियम नहीं, जो अवश्य करना पड़ता हो । हाँ ! पादरियोंको तो कुछ नियम मानने पड़ते हैं, क्योंकि, उनको वही काम है । पादरियोंके भी भजनका कोई विशेष नियम नहीं, वरन् रविवारको गिर्जाघरमें जाकर उपस्थित होना और आये हुये लोगोंको बाइबल आदि किसी-धार्मिक पुस्तकका कुछ भाग पढ़कर सुनानाही उनका नियम है ।
पहले इस धर्मके फकीर (पादरी) लोग भजन और संयम किया करते थे, गुफाओंमें बैठकर ईश्वरके नामका अभ्यास किया करते थे, जिससे उनका अन्तःकरण शुद्ध और प्रकाशमय होता था । अब पादरियोंमें यह बात कहीं नहीं पाई जाती । ईश्वरके नाम स्मरण, बिना अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानका प्रकाश प्राप्त होना कठिनही नहीं वरन् असम्भव है ।
इतिहासोंसे जाना जाता है कि, वे पादरी, जिनसे कि, ईश्वरके नामका स्मरण और ईश्वरकी भक्तिका प्रकाश ईसाई धर्ममें फैलता था वे अब नहीं हैं । न उनका उपदेश किया हुआ नामही इन धर्मवालोंमें शेष रहा । वह नाम जिससे ईसाई साधु लोग ईश्वरी ज्ञान प्राप्त करते थे अब उसका कहीं पता नहीं । वर्तमानके ईसाईलोग नाम तो क्या लेंगे, वरन् अन्य धर्मवालोंको ईश्वरका नाम लेते देखकर हँसी, ठट्ठा उड़ाते हैं । यहाँ तक कि, उनके खण्डनमें सैकड़ों पुस्तकें छापकर प्रकाशित भी कर चुके हैं ।
जो भोजन भक्ति ईसाइयोंमें प्रथम भी थी अब उसका लेश भी नहीं रहा वरन् सबके सब सांसारिक विषय वासनाओंमें पड़कर ईश्वर भूल बैठे हैं, जो धर्मके उपदेशक पादरी लोग हैं, भारी २ वेतन पाते हैं, बगी और घोड़े दौड़ाते हैं, विषय वसानामें खूब मस्त रहते हैं; वे ईश्वरका नाम क्या जान सकते हैं ।
यह वर्तमानके विद्याभिमानी, पक्षपाती, धर्मद्वेषी और ढोंगियोंका कर्तव्य है कि, अब संसारसे ईश्वरके नामका जप स्मरण सब उठ गया । कुत्ब मुकद्दस (पवित्र पुस्तक) बाइबिलमें अपनी सम्मति मिलाकर बहुत भेद डाल दिया । उसमें जो गुण पहले था वह अब नहीं रहा । धर्मद्वेषी और विद्याभिमानियोंकी समझमें सूक्ष्म भेदकी बातें नहीं आती, बाहरी साधारण बातोंको कुछ २ समझ कर अपने विचारोंके ढंगकी बना लिया है । वास्तवमें उनका कुछ