कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1216, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजल ।
हुआ मगूरूर क्योंकर आन दिन चार । रहेगा तेरा शौकते शान दिन चार ॥
हुआ अन्धा ब मस्ती ऐश बइशरत । कमालो फ़ज़ल और बूहरहान दिनचार ॥
अकेला आया है जावै अकेला । मेरा और तेरा है घमसान दिनचार ॥
नहीं कोई रह फ़ना होवे गे लारेब । किसीका तो पकड़ दामान दिनचार ॥
पकड़ दामन तू साचे सद्गुरु आजिज । यह बे बीना न दस्तरखवान दिनचार ॥
गजल—जो कुछ कि, नजर आता है तेरे कुछ न रहेगा ।
महासूस ब मरगूब सगर धार बहैगा ॥
ताजो तख्त ब बख्त सो सब काल चक्करमें ।
फानी है ब मुरदार सभी कुछ चुछैगा ॥
भक्ति ब गरीबी है यही न्यामते दुनिया ।
सद्गुरुकी पनह आ नहिं तो काल आग डहैगा ॥
चौरासीकी योनिमें पडा बैठ ऊपर हो ।
यम जालिमकी इसमें बड़ी मार सहैगा ॥
आजिज होवें जो आजिज इस बहरके गरदाब ॥
बिन सद्गुरुके कौन तेरी बाँह गहैगा ॥
गजल ।
न सद्गुरु भक्ति जाना तूने अ सोस । न उसकी बात माना तूने अफ़सोस ॥
बहर जानिब वह कहता है ब आवाज़ । न अपना कान तानातूने अफ़सोस ॥
वह हर जानिब वह हर रूखसे पुकारें । न जाना मिहर बानातूने अ सोस ॥
भटक रह रास्तेसे फिरता किधरको । अमल बद मार खाना तूने अ सोस ॥
चला तू चाल है सद्गुरुके बर अक्स । किया सब कारखाना तूने अफ़सोस ॥
जो कहते २ ही आजिज थका वह । किया इस घर न थाना तूने अफ़सोस ॥
मुखम्मस तर्जिया बन्द ।
गुरुको भूलै खुदा तूझे भूले । जाके यमराज दर ऊपर झूलै ॥
गो कहूर बान तू कहूरबान वह । हा हो गये जाके आगमें पोखे ॥
गुरु मिहरबान तो मिहरबान वह । पाते न्यामत हैं लंगडे और लूले ॥
गुरुके वे मेहर दौलते ईमों गुरु । कत्ल करेको हाथियोँ होले ॥
गुरुकी पूजा बिना धर्म ईमान ॥
हो गया मुरदा इसमें शक मत जान ॥