भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अंधको दर्पण वेद पुराणा

संसारको लोग जो वेद पुराण पढ़ते हैं उनका पढ़ना अन्धोंकी आरसीके समान है । जैसे अन्धोंको आरसी दिखलानेसे कोई लाभ नहीं होता, वह अपना न तो मुँह देख सकता है, न उससे कुछ आनन्द प्राप्तकर सकता है । यदि अंधा दर्पण हाथमें लेकर उसका अभिमान करे कि, मेरे पास दर्पण है, तो उसका ऐसा अभिमान देखकर आँखवाले लोग हँसते हुए मूर्ख जानते हैं । ऐसेही अशुद्ध अन्तः-करणवाले अज्ञानी पुरुषोंका वेद पढ़ना है । ऐसे लोग वेदपाठसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते, मिथ्या अभिमान करते हैं । जैसे अन्धा हाथोंसे टटोलकर पदार्थको छू सकता है पर उसके स्वरूपके आनन्दको नहीं प्राप्त कर सकता । उसी प्रकार अशुद्धान्तःकरणवाला यदि वेदको पाठकर जावे तो भी उससे कुछ पा नहीं लेता न वेदके यथार्थ आशय और गुणको ही जान सकता है ।

दर्बी कहाँ महारस जाना ।

इसी प्रकार दर्बी अर्थात् कड़छी जो कि दाल, चावल, हलुआ, शाक आदि सर्व व्यञ्जनमें फिरती पर उसको उनके स्वादका कुछ भी ज्ञान नहीं

जस खर-गंवारा ।

ऐसेही यदि गदहेके ऊपर चन्दनका भार लाद दिया जावे तो उस चन्दनकी सुगन्धि और गुणसे उसको कुछ लाभ नहीं होता ऐसाही अशुद्धान्तःकरण, मनुष्यत्व, गुणशून्य, पुरुष कड़छीके समान सब वेदोंका दिन रात अभ्यास करता रहे अथवा गदहेके समान वेद पाठके अभिमानका बोझ उठाये फिरे तो उसको कुछ लाभ नहीं हो सकता

कहै कबीरअभिमाना

कबी साहब कहते हैं कि, आकाशको खोजता फिरता है पर वह मिलता जिसका कि अभिमान नष्ट हुआ हो ।

परमात्मा जिसको स्वयम् मार्ग दिखावे वही उससे मिले उसको पहचाने जिससे अभिमान दूर हो । यह गुण तो केवल सत्यगुरुमेंही है, जिसके कि मिलनेसे शाह सिकन्दर लोदी जैसे अभिमानी धर्म द्वेषीका सब अहंकार नष्ट हो गया, सत्यगुरुके चरणोंका रज बन गया । कबीर प्रसङ्गमें गरीब दासजीकी वाणी देखो—

“चरण धोइ पिये सिकन्दर सिताब । तुम्ही अशंमका तुही है किताब ॥”

ब्राह्मणका कत्तल — सिकन्दर लोदी इतना बड़ा धर्मद्वेषी धर्माभिमानी पुरुष था कि, एलफिन्स्टन नामक इतिहास लेखक अङ्गरेज अपने इन्डियन् हिस्ट्रीमें एक हाल इस प्रकार लिखता कि एक समय मुसलमान लोग किसी स्थानपर