भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1262

इसी प्रकार मूर्तिपूजाकी कहीं कहीं स्थापना है और कहीं कहीं तो बड़ी मोक्ष देनेवाली बतलाई है।

कालपुरुष सबकी बुद्धियोंपर अधिकृत हो उसपर इस प्रकार शासन करता है कि, सर्व धर्मवाले परस्पर विरोधमें पड़ राग द्वेषमें ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं किसी उपायसे भी सत्पुरुषकी भक्तिकी ओर नहीं लगते। जब कोई सत्य भक्तिकी ओर लगता है तब नानाप्रकारकी युक्ति उपायों द्वारा उसमें विघ्न डालता है। क्योंकि, काल पुरुष भयमें रहता है कि, कोई मेरे शासनसे बाहर न जावे। इसी धोखे और छलसे सब मनुष्योंको अपने पाशमें फँसा रक्खा है। पूर्वीय अज्ञान और विचार और पश्चिमीय चार किताब मनुष्यके फँसानेके हेतु महाजाल हैं। इन महाजालोंसे बाहर निकलना बहुत कठिन है। सबके सब इसीमें भटक भटककर मर जाते हैं।

भवतारणका उपाय — सब मनुष्योंको जानना चाहिये कि, जिसको वे निराकार निर्लिप्त परमात्मा कहते हैं वह केवल एक ठीकादार है बाकी सब परमेश्वर उसकी ओरसे कारबारी हैं। ठीकादार तो अपने ठीकेका दिन पूराकरके लुप्त-होजावेगा उसके कारबारी तो उससे भी प्रथम अपने कर्मानुसार प्रस्थान कर जावेंगे। सर्वश्रेष्ठ प्रभु, अजर, अमर, एक रस आदि गुणोंवाला परमात्मा इन सबोंसे भिन्न है, वो केवल सत्गुरुकी कृपा द्वाराही जाना जाता है। एक लाख अस्सी सहस्र पैगम्बर हो गये वो सब उसी ठीकेदारके पुत्र हैं, सबके सब उसी एककी साक्षी देते आये हैं। किसीने ठीकेदारकी सुधि बतलाई, किसीने दूसरे खुदाओं का पता बतलाया। इस प्रकार सब झूठे भ्रमकोही बतलाते आये, यदि उनको सच्चे परमात्माकी खबर होती तो ऐसी झूठी साक्षी न भरते।।

सत्य पुरुषके जितन पुत्र ह सबमें कालपुरुष महान् बलिष्ठ हैं। उसने अपने तप और भक्तिके बलसे तीनों लोकोंकी ठीकेदारी प्राप्त की है सत्तर असंख्य युगतक ठीकेदारी करके फिर चला जावेगा, दूसरे ईश्वरभी लय हो जावेंगे, शेष शुद्धपरमात्मा जिसकी सत्तामें सब हैं उसीकी भक्ति करनेसे मुक्ति प्राप्त होगी। सबका हर्ता कर्ता वही है। ब्रह्म, जीव, ईश्वर, माया उसीके शासनमें हैं। वह कहने, सुनने, बुद्धि, अनुमान सबसे परे हैं। सत्गुरुकी दया बिना उसका मिलना असम्भव है जो कहने सुनने, जानने, विचारने और निश्चय करनेमें आता है वो सब माया है मिथ्या भ्रम है। धन्य है वह पुरुष जो सच्चे परमात्माको दृढ़ता है, उसकी भक्ति का अनुरागी तथा प्रेमी होकर अपना सर्वस्व उसके ऊपर निछावर करता है। उसीकी कृपासे भवसागर तरा जा सकता है, दूसरा कोई भी उपाय नहीं है।

कालकी फांसीसे त्राण।

जो कोई कालकी फांसीसे बचा चाहता है वो साधुकी सेवा और संगति