कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1270, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंवस्तु हमारी अगम अगोचर, लेके सराफ़ी जैये ।
लगी हाट यम जाल पसारा, तब वह वस्तु भजैये ॥
तौल तालकी जमा सुलाखी, तब वाको घर पैये ।
केतिक चोर फिरें गलियनमें, तिनते मत लुटवैये ॥
वस्तु अगोचर शब्द अनाहत, यहि विधि ध्यान लगैये ।
कहैं कबीर भावे सौदा, सद्गुरु होय लखैये ॥
साखी— हीरा रतनकी कोठड़ी, बार बार मत खोल ।
जो कोई आवे रतन पारखी, तब हीराका मोल ॥
९ प्रश्न—प्रत्येकमतमें मुक्तिका विचार—किसी धर्ममें (मजहब) कोई क्यों न हो यदि वह पुण्य करे, सर्वदा सदाचरणसे वरते तो मुक्त हो कि, नहीं ?
उत्तर—सुकृत पुरुषोंको उनके पुण्यका फल अवश्य मिलेगा पर पाप और पुण्य दोनोंही बन्धनके कारण हैं एकसे स्वर्ग दूसरेसे नर्ककी प्राप्ति होती है किन्तु मुक्ति नहीं होती। क्योंकि वो सद्गुरुके बिना कदापि नहीं मिलती जिस प्रकार ए नजिनके बिना रेल नहीं चलती उसी तरह गुरुज्ञानके बिना सत्यपद मिलना कठिन है। हाँ, इतना तो अवश्य है कि, जो अपने पुण्यको पूर्ण करते हैं उनपर सत्यगुरुकी कृपादृष्टि होती है, क्योंकि इस जीवको सदा सत्यगुरुकी अपेक्षा है।
कोई मनुष्य पूर्णपुण्य स्वरूप नहीं हो सकता। क्योंकि, पूर्वके अनेक जन्मोंसे इनके पाप पुण्यका सम्बन्ध होरहा है वरन् तौरेतके अनुसार मनुष्य जिसकी सन्तान है वह सबका पिता आदमही ईश्वरकी अवज्ञासे पापी हुआ। यही बात नहीं, वह ईश्वरकी अवज्ञासे प्रथम भी पापी था। उसके पापोंका सम्बन्ध अनेक जन्मोंसे चला आता था, जिसके कारण वह पीछे न भी अवज्ञाकारी और पापी हुआ। यद्यपि आदमकी उत्पत्तिमातृगर्भसे नहीं तो भी उसमें पाप थे। क्योंकि उसका अन्तःकरण विषय वासना और शारीरिककामनाओंसे भरा हुआ था। यही कारण है कि, उसका मन सांसारिक भोग विलासकी ओर आकर्षित हुआ। उसे स्त्री मिलने की बड़ी अभिलाषा थी जो उसके पतित होनेका कारण हुआ यदि उसमें पाप न होता तो वासना भी न होती वह निरपराधी दुःखमें न पड़ता इससे यह सिद्ध होता है कि, पहलेही पापसे दूषित था पूरा पुण्यस्वरूप नहीं था। मनुष्यको उचित है कि, पुण्यको पूर्णतापर पहुँचानेके लिये पूर्ण उपाय करे सत्यगुरुसे उसके फलकी आशा रखे। सर्वदा दृढ़ताके साथ यही विश्वास हृदयमें धारण करें कि, सत्यगुरुही बेडा पार करनेवाला है ?