भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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देखकर अगस्तीनने पूछा कि, तू क्या करता है ? बालकने उत्तर दिया मेरी इच्छा है मैं समुद्रको सुखा दूँ । अगस्तीनने कहा कि इस छोटेसे छिद्रमें तू समुद्रको कैसे भर सकता है ? यह बात सुनकर बालकने उत्तर दिया कि, यदि मैं समुद्रको इस छिद्रमें नहीं भर सकता हूँ तो तू ईश्वरके भेदको अपने छोटेसे मस्तिष्कमें किस प्रकार भर सकता है ? जिस प्रकार तू शैतान विषयक तर्क वितर्क अपने मनमें कर रहा है उसी प्रकार मैं समुद्र सुखा रहा हूँ । तू अपनी सीमाबद्ध बुद्धिसे असीम परमात्माके भेदको किस प्रकार जान सकता है ? यह कहकर वह बालक अंतर्धान हो गया । यह देख अगस्तीन मनही मन बहुत लज्जित होकर सत्यका विश्वासी हुआ ।

२९ प्रश्न—अवस्था साम्य, उस ब्राह्मणको जो सरयूके तटपर मायाको देखनेके लिये तपस्या करता था उसके तथा शाहुरूपके दृष्टान्तसे जाना जाता है कि, जाग्रत और स्वप्न एक बराबर ही है ?

उत्तर—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तुरिया और तुरियातीत ये सब अवस्था और उनके मध्यमकी दशा सब जीवकी अविद्यासे उपन्न होती हैं, इनको प्राप्त हुआ जीव नानाप्रकारके कौतुक देखा करता है । जो कुछ देखता है वो वाजीगरके खेलके समान मिथ्या लीलाकोही देखाता है । पर शुद्ध ज्ञान न होनेके कारण उसी असत्यमेंसे जिसपर विश्वास जम जाता है सत्य मान बैठता है । माया बड़ी प्रबल है । उसमें यह शक्ति है कि, क्षणमात्रमें ब्रह्माण्डको बनावे और बिगाड़े । यह मायाकाही आवरण है कि, सब लोगोंका यह संकल्प दृढ़ है कि, मैं अमुक नगर और स्थानका वासी हूँ, अनेक पीढ़ियोंका इस भूमिपर मेरा अधिकार है, यद्यपि कोई नहीं जानता कि, कौन नगर कब बसा और यह देश कबसे है तथापि अपने को उसका मालिक माने बैठे हैं । जो छोटे गामोंकी उत्पत्ति स्थितिको नहीं जान सकता वह संसारकी उत्पत्ति स्थितिको क्या जाने ? अपने २ अनुमानसे सब जाति और धर्मके लोगोंने जैसा २ निश्चय किया है वैसा २ अपने ग्रन्थ और पोथियोंमें लिख दिया है, उनके अनुयायियोंके लिये वही सत्य और स्थिर सिद्धान्त हो गया है । राजा विदग्धज्ञान क्षणमात्रमें सहस्रों वर्ष व्यतीत होगये थे । समस्त संसार गन्धर्वनगरके समान है । वस्तीका उजाड़ और उजाड़का वस्ती करना मायाकी लीला मात्र है । मायामें क्या नहीं हो सकता ? मायाकी इसी विचित्र शक्तिमें पड़े सर्वजीवधारी वारंवार गते खा रहे हैं । जबतक मायाके पार नहीं होते तबतकही बंधन है ।