कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1289, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंको चला । दो चार दिनतक अशरफी देकर उस आदमीने अशरफी देना बन्दकर दिया, साधु फिर वृक्ष काटने चला । मार्गमें वही मनुष्यमिला । पूछा कहाँ जाता है ? साधुने कहा वृक्ष काटने । इस पर उसने कहा सावधान ! यदि अब वृक्ष काटनेका विचार रखेगा तो तुझे मार डालूंगा । साधुने उसका कहना न माना तब फिर दोनोंमें मल्लयुद्ध आरम्भ हुआ अबकी साधु हारा, उक्त मनुष्य उसे पछाड़ कर छाती पर बैठकर कहने लगा कि, अब मैं तेरा शिर काटता हूँ । पश्चात् साधूके बहुत गिड़गिड़ाने पर उसे छोड़ दिया । छूटनेपर साधूने पूछा कि कृपा कर यह बतलाओ कि तुम कौन हो ? इसका क्या कारण है कि प्रथम मैंने तुमको पछाड़ा था पर अब मैं हार गया । उसने उत्तर दिया मैं शैतान हूँ ; तुमने प्रथम मेरे ऊपर जय प्राप्त की वह तुम्हारी निष्कामताका फल था ; उस समय तुम्हारी दृष्टि परमार्थपर थी इसी कारण तुममें ईश्वरी बलका आवेश हुआ था पर अब तुमने अशरफी न मिलनेके कारण क्रोधित हो स्वार्थवश वृक्ष काटने का संकल्प किया इसी कारण मैंने तुमको जीत लिया ।
इससे यह प्रसिद्ध हुआ कि, जो निष्काम होकर सच्चे मनसे ईश्वरकी भक्ति करता है वह ईश्वरको प्यारा होजाता है पर जो कामना सहित भजन करता है उसका फल भी वैसा ही पाता है ।
६४ प्रश्न— धर्मके चार चरण, कौन कौनसे हैं ?
उत्तर—सत्य, शौच दान और दया, यही धर्मके चार चरण हैं । तिनमें प्रथम सत्य उसे कहते हैं जो कि, बाहिर और अंतर किसी प्रकारसे असत्यका लेश न हो । महाराजा युधिष्ठिरको कृष्ण भगवान्ने अश्वत्थामाके मरनेकी संदिग्ध द्व्यर्थक बात कहलाकर सत्यके रूपमें झूठ बोलवा दिया । जिससे अश्वत्थामाके जीवित रहनेपर भी द्रोणाचार्यने उसे मरा जान प्राण त्याग कर दिया । इस प्रकार संशय युक्त दो अर्थसूचक वाक्यको कहना भी असत्य ही होता है, उसे सत्य नहीं कह सकते । जैसे देखा, सुना, पढ़ा, अनुभव किया हो वैसाही कहना सत्य है ; सन्देह भरी बात कहना असत्यमें परिगणित होता है । सत्यके छः स्थान हैं जो इन छः स्थानोंको प्राप्त होगा वह अवश्य सत्यताको प्राप्त कर लेगा ॥
प्रथम—ईमानकी सच्चाई अर्थात् कभी किसीसे झूठ न बोले ।
दूसरी—ईश्वर से सत्य और निष्कपट हृदयसे प्रार्थना करे । यदि मन कहीं दूसरे स्थानमें हो तो कहे कि, हे प्रभु ! मैं तेरी प्रार्थना करता हूँ तब उस समय ईश्वरसे झूठ बोला । यदि मन संसारके पदार्थोंमें मोहित हो अपनेको