भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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तो परमेश्वरको पहचाना और न मुक्तिके यथार्थ पथकोही जाना । यदि हंस कबीर लोगोंको समझाते हैं कि, ये वेद तो भ्रम और धोखेकी टट्टी है, ये आठों वेद जञ्जालोंमें फँसे हुओंके निमित्त हैं, मुक्ति पाएहुओंके निमित्त नहीं तो कोई कहना नहीं मानता और व्यर्थ वादविवादके लिये प्रस्तुत होता है, सब संसारी मनुष्य इन्हींमें फँस रहे हैं और इन्हींको अपना धर्म समझते हैं ।

इन आठों वेदके निष्प्रयोजन टट्टे बहुत हैं, जिनको पढ पढकर सब मनुष्य अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं, । किसी प्रकारकी खोज कोई नहीं करता । न तो स्वसंबेद को कोई जानता है और न उसकी शिक्षाको स्वीकार करना उचित समझता है । अब इसके आगे पांचों देवताओंके पंथ प्रचारका वर्णन लिखा जाता है ।

छ्यासठवाँ प्रकरण

१ निरञ्जनका पंथ ।

पांचों देवताओंमें सबसे बड़ा निरञ्जन देवता है और जैसा कि, कबीर साहबने पंथ 'कबीरवाणी और अनुरागसागर और भवतारण इत्यादिमें लिखा है । वही तीनों लोकका रचयिता और स्वामी है । ब्रह्माण्डके सिरेपर उसकी स्थिति है । वही सहस्र दल कमलमें अपनी शक्ति सहित रहता है, योगसमाधि इत्यादि द्वारा उसका दर्शन होता है, यही तीनों लोकोंका राजा तथा सृष्टि रचयिता है और इसीकी पूजा समस्त संसार करता है । अब चारों देवी तथा देवताओंके धर्मोंका विवरण करता हूँ ।

सरसठवाँ प्रकरण

२ आदिभवानी-अद्याका पंथ ।

पहले आदिभवानी है, यह तीनों देवताओंकी माता है तथा बड़ी प्रभाव शालिनी है, तीनों देवता उसके सामने डरते कांपते हैं और उसकी सेवा किया करते हैं । इस अध्याने चाहा कि, अपने तीनों पुत्रोंकी परीक्षा करलू जिसमें जान पड़े कि, कौन, इन तीनोंमें उसके अनुकूल है जिसके साथ वह रहै ।

कालीपुराणमें इस प्रकार लिखा है कि, सृष्टिके उत्पन्न होनेके पहले तीनों भाई एक स्थान पर बैठे, एक वृक्षकी छाहमें आपसमें बातलाप कर रहे थे, उस समय उन लोगोंने ऐसा कौतुक देखा कि, एक रक्तकी नदी महावेगसे बही चली आती है, जिसमें निरा रक्तही रक्त है और कुछ नहीं है । उस नदीमें कूड़ा कुरकुट