भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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रमैनी - ररंकार माया ठहरावा । सब जग आन कर्ता बतलावा ॥

मृत्युलोकमें प्रगटचो जाई । बालक रूप दियो दिखाई ॥

घर घर सबसे भाष्यो ज्ञाना । चीनोरे नर पुरुष पुराना ॥

जो देखे सो लेई उठाई । गोद उठायके मोहि खेलाई ॥

काको सुत यह परचो भुलाई । मातु पिता केहि देश हैं भाई ॥

दियो ढील यह काको बारा । होय दुखिया नगर मँझारा ॥

यदि विधि सबहिढील मोहिदीना । कोइ यक जीव जो हमको चीना ॥

बालक रूप त्याग हम दीना । तब तरुन भेष धरि लीना ॥

घर घर सबसे कियो पुकारा । चीन्होरे नर सिर्जनहारा ॥

नाना विधि मैं कहूँ बुझाई । तऊ न अंध मोहि पतियाई ॥

सब मिलि कहें तरुन यह आही । ग्रह माहि नहीं या कोई चाही ॥

सुन्दर वदन जो बहुत विराजा । बिन चिन्हे वाको नहीं काजा ॥

तरुण त्यागा हम तबहीं । कीन स्वरूप वृद्धको जबहीं ॥

आदि ब्रह्म निर्गुण कह भाई । ताको सब मिलि गहो बनाई ॥

तिन पुनि माया ज्योति बनाई । काहि नरक सब परयो भुलाई ॥

शिव शक्ति त्रिगुण उत्पानी । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जानी ॥

इतना भेद कहा हम जबही । क्रोध भयो जीवनको तबही ॥

सब मिलि कहै बुढ़ापा आई । आन की आना कहे लछु भाई ॥

ब्रह्मा विष्णु कर्ता हैं भाई । ताहि छोड केहि सेवा लाई ॥

यहि विधि सब मिली कीन पुकारा । तब हम घटमें कीन बिचारा ॥

होय गुप्त आकाशहि गयऊ । रह्यो छपाय दरश नहि दयऊ ॥

होय अधर मैं बोल्यो बानी । जाते जीव करे पहिचानी ॥

नाम निःअक्षर गहो निज डोरी । त्रिगुण फन्द ते लैहौं छोरी ॥

जबहि गुप्त होय बोल्यो बानी । तबहि सब मिली अचरज मानी ॥

देव दैत्य भयो यह बानी । ना जानू कुछ होईहि हानी ॥

कोई कहै यह भलो न बाता । कोई कहे यह जान विधाता ॥

कोई यक जीव अंकुरी होई । तब निज हमको चीन्हे सोई ॥

यहि विधि देखा सकल जहाना । तब पुनि कीना लोक पयाना ॥

भावार्य - आदि सृष्टिमें जब सत्य युग आरम्भ हुआ तब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट हो बालकका स्वरूप धारण कर सत् पुरुषकी भक्तिका उपदेश