भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृथ्वीपर हैं उन सबमें बड़ा श्रेष्ठ धर्म यह वैष्णवोंका है ये वैष्णव जब अपने समस्त चिन्हां सहित दीख पड़ते हैं तब जान पड़ता है कि, सतोगुण मूर्ति धरकर निकल पड़ा है इनके रखना दश चिह्न होते हैं—१ भद्रवेष्ट अर्थात् दाढ़ी मूँछ शिरके बाल और नाखून आदि मुड़ेहुए, २ तप अर्थात् पूजन बंदना करना, ३ भीतर बाहरसे विशुद्ध रहना, ४ तुलसीकी कण्ठी गलेमें, ५ रामकृष्ण मंत्र, ६ बारह तिलक, ७ यज्ञोपवीत, ८ चोटी, ९ कमण्डलु, १० श्वेत वस्त्र; इन दश चिह्नों सहित जब वे प्रगट होते हैं तब जान पड़ता है कि, वे पानीके स्वरूप सतोगुणकी प्रतिमूर्ति हैं जब इन चारों सम्प्रदायोंके वैष्णवोंकी पूजा उपासना उच्चश्रेणीपर्यन्त पहुँचती है तब वे लोग पाँचवी सम्प्रदायमें मिलकर, धर्म ऋषि गुरुसे मिलते और स्वसम्बेदको प्राप्त होते हैं। वह धर्मऋषि कवीर साहब हैं, जिनका वह स्वसम्बेद है। अतः इन चारों सम्प्रदायका द्वारा कवीर साहबके घरकी ओर खुला हुआ है। यद्यपि वे लोग ठाकुरकी मूर्तिका पूजन करते हैं, तथापि उनका पूजन उन्हें सत्यगुरुसे मिलावेगा और यह मूर्तिपूजा उनको इस प्रकार उचित मार्गपर लगावेगी जैसे पिता माता अपने छोटे बच्चोंको धूल मिट्टी और झुनझुना इत्यादि खेलनेकी आज्ञा देते हैं और जब तक वे अज्ञान रहते हैं तबतक उनको इस कार्यसे निषेध नहीं करते, पर जब उनमें कुछ ज्ञान आजाता है तब उनको दूसरे काममें लगाते हैं। यह विष्णु सतोगुणी देवता है और उसके भक्त लोग सब सतोगुणी हैं, उनके रूप लक्षणसे ही सतोगुण प्रगट होता है।

यहांतक मैंने विष्णुसम्प्रदायका वृत्तान्त लिखा, अब शांकरीसम्प्रदायका विवरण करता हूँ।

शांकरीसम्प्रदायका वृत्तान्त ॥

१—पूर्व ओर गोवर्धन मठ, भूगमबार सम्प्रदाय, वनारण्य द्विपद, पुरुषोत्तमक्षेत्र, जगन्नाथ देवता, पद्माचार्य, चैतन्यब्रह्मचारी, तीर्थ महोदधि, विमला देवी, राते ब्राह्मण, ऋग्वेद, गटकन्य उपनिषद्, अकारमात्रा, परज्ञा, नम् । आनंदम् ब्रह्म महावाक्य । २—पश्चिम ओर शारदामठ, कीटमवार सम्प्रदाय, तीर्थ द्वारका क्षेत्र, सिद्धेश्वर देवता, भद्रकाली देवी, स्वरूपाचार्य, नन्दा ब्रह्मचारी, तीर्थ गोमती सामवेद, उपनिषद् ब्राह्मण केन, तत्त्वमसि महावाक्य, उकारमात्रा, १ तीर्थ, आश्रमा द्विपद । ३—उत्तर ओर जोशीमठ, आनन्दवार सम्प्रदाय, पद तीन, १ गिरि, २ पर्वत, ३ सागर, क्षेत्र बदरिकाश्रम, नारायण देवता, पुण्यगिरि देवता, त्रिविद्काचार्य, नन्दा ब्रह्मचारी, तीर्थ अलकनन्दा, ब्राह्मण ब्रह्म, अथर्ववेद, माण्डूक्योपनिषद्, मामात्रा, अयंआत्मा, ब्रह्म महावाक्य । ४—दक्षिण ओर, श्रीनगरी