कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1359, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरे औसाफ लायक न मलायक । है क्या इमकान इन्सांकी जबांको ॥
न जानां भेद कुछ हम्दे सरायां । बयां किस तौर कीजे लाबयांको ॥
तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार । तुही बख्शे अद् और दोस्तांको ॥
अलख तूही है कोई लख न पाया । न जाने भेद तुझे राजे निहांको ॥
तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद । तुही देता है हरकस हर जमांको ॥
बहर खान व बहर शान व बहर शै । तुही था और तुही होगा तुही है ॥
हज्जारी पीर पैगम्बर बनाये । जुदा सब मजहबो मिललत चलाये ॥
नहीं वह नूर सद मामूर तारे । मिहर तुझ रख मिहर दैजूर जाये ॥
नहीं लमअ सोसद शमाअ शविस्तां । कि बरकत तेरीदिन मशअल जलाये ॥
शरीअत शाखकर सारी मुखालिक । न जाते राह इन्सांको बताये ॥
नबी पीरां फकीरां कैल फरजन्द । सभी औतार धर अल्लह बताये ॥
सभोंमें बरतरीं हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥
जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । नराहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥
नहीं मजहबसो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूना चलाये ॥
किया मुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरह दिलको झुकाये ॥
फँसे उसदाममें आराम जानां । जपे सब राम नहिं सत नाम पाये ॥
पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥
किया तब रहम तू मुशिद हकीकी । जो साहब था सत सुकृत कहाये ॥
करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥
तेरी मस्तोंकी महतीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दिवाना ॥
अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहक का बहाना ॥
कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमींके जा छिपाना ॥
कोई गावे बजावे तान तोड़े । नकल भाँडोंकी सबने अकल ठाना ॥
हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपना यगाना ॥
तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पिया । लिया सौ जान मुर्दोंका जिलाना ॥
नहीं भगवाँ तिलक कण्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥
हुआ जब अस्लसे वह वस्ल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥
तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकल आदमकी ठिकाना ॥
मुअत्तर मगज उसबूसे हुआ जब । तो दानाई को खो बैठे हैं दाना ॥
हुए बेखुद खुदीको खोये बैठे । न अब तक तीर पहुँचा वर निशाना ॥
कितें पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥