कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस चार सम्प्रदायके धामक्षेत्र लिखनेसे मेरा यह तात्पर्य है कि, विष्णुके चार सम्प्रदाय हैं उसमें पांचवां धामक्षेत्र कबीर साहबका है, इस कारण कि सारे वैष्णव अन्तमें कबीर साहबसे मिलकर परम धाम को सिधारेंगे, समस्त वैष्णवों के गुरु कबीर साहब हैं, और उनका वेद स्वसम्बेद है और यह संन्याससम्प्रदाय विष्णुसम्प्रदायके अधीन है।
बहत्तरवाँ प्रकरण
भवसागर ।
इस अद्याने चारों खानिकी उत्पत्तिके पूर्व अपने पुत्रोंको जो रक्तकी नदी दिखलायी थी वह भवसागर है। वही नदी स्त्रीकी योनि है, जो रक्तसे भरी हुई है, इसीसे सबकी उत्पत्ति होती है, कारण यह कि, जो ब्रह्माण्डमें हैं सो पिण्डमें हैं, कभी इस योनिके भीतर जाता है और कभी बाहर निकलता है, जब स्त्री पुरुष संभोग करते हैं तब वही स्वरूप प्रगट करते हैं, कभी भीतर और कभी बाहर आना जाना अपना आवागमन स्पष्टरूपसे प्रगट करता है।
कबीर साहबका वचन देखो बीजक ।
चौदह लोक बसै भग मोहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥
भग भोगे ओ भगत कहावै । फिर फिर भग भोगनको आवै ॥
तिहत्तरवाँ प्रकरण
बन्धन ।
यह मनुष्य स्त्रीके साथ संभोगकी कामना रखता है, इस कारण बारंबार इसका आवागमन होता है और जितनी स्त्रीके साथ यह संभोग करता है, उन सबके गर्भसे उसको उत्पन्न होना पड़ता है। यही स्वसम्बेदका आदेश है, इसी कारण मनुष्यके आवागमनका संबंध नहीं टूटता और दिन २ प्रति विशेष दृढ़ होता जाता है।
इस संसारमें जितने धर्म हैं सो सब इन्हींके हैं और इन पांचोंके अतिरिक्त क्या है इसका मनुष्य मात्रको तनिक भी ध्यान नहीं, नरक, वैकुण्ठ और चार मुक्ति, धनसम्पत्ति, राजकाज सबके प्रदान करनेवाले यही हैं। पांचों सब कुछ दे सकते हैं, पर मुक्ति देना इनके वशमें नहीं, कारण यह कि, वे स्वयम् आवागमनसे रहित नहीं हैं और दुःख सुख पाया करते हैं, जिस बातमें वह स्वयम् असमर्थ हैं तो दूसरोंको क्या दे सकेंगे।