भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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सहजका लोकको जाना ।

तबही सहज लोक पगुधारा । कीन्ह दंडवत बारम्बारा ॥

पुरुषवचन—सहज प्रति ।

अहो सहज कस इहवाँ आऊ । सो हमसों तुम सन्द सुनाऊ ॥

कबीर बचन—धर्मदास प्रति ।

कह्या सहज तव धर्मकी वाता । जो कछु धर्म कही विख्याता ॥

धर्मराय जस विन्ती लायी । तैसे सहज सुनायउ जायी ॥

पुरुषकी आज्ञा सहजसे ।

आज्ञा पुरुष दीन्ह तेहि बारा । सुनो सहज तुम वचन हमारा ॥

कूर्म उदर आहि सब साजा । सो ले धरम करे निज काजा ॥

विनती करे कूम सो जायी । माँगि लेइ तेहि माथ नवायी ॥

सहजका धर्मरायके निकट जाकर पुरुषकी आज्ञा सुनाना ।

गये सहज पुनि धर्मके पास । आज्ञा पुरुष कीन्ह परगासा ॥

विनती करो कूर्मसो जाई । माँगि लेहु तेहि सीस नवाई ॥

जाय कूर्म ढिग सीस नवावहु । करिहैं क्रिपा बहुत तब पावहु ॥

निरंजनका कूर्मके पास साज लेनेको जाना ।

चलिभो धरम हरष तब बाढो । मनहि कीन जुमान अतिगाढो ॥

जाय कूर्मके सन्मुख भयऊ । दंड परनाम एक नहि क्रियऊ ॥

अमी स्वरूप कूर्म सुखदाई । तपत न तनिको अति सितलाई ॥

करि गुमान देख्यो जब काला । कूर्म धीर अति है बलवाला ॥

बारह पालँग कूर्म सरीरा । छै पालँग धरम बलवीरा ॥

धावे चहुँ दिस रहै रिसाई । किहि विधि लीजे उत्पति भाई ॥

कीन्हो रोष कोपि धर्म धीरा । जाय कूर्मसे सन्मुख भीरा ॥

कीन्हो काल सीस नख घाता । दरते निकसे पवन अघाता ॥

तीन सीसक तीनहु अंसा । ब्रह्मा विस्नु महेशुर बंसा ॥

पाँच तत्त्व धरती आकासा । चंद सूर उडगन रहिवासा ॥

निसरचो नीर अगिन ससि सूर । निसरचो नभ ढाकन महि थूर ॥

मीन सेष बराह महि थम्भन । पुनि पिरथीको भयो अरम्भन ॥

छीना सीस कूर्मको जबहीं । चले परसेव ठाँव पुनि तबहीं ॥

जबही परसेव बुंद जल दीन्हा । उंचास कोट प्रिथ्वीको कीन्हा ॥

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