कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपदेश दिया जिसे कि कोई २ पुरुष वेद कह कर भी बोलते हैं। जो भवके परितापोसे छूटना चाहते हैं जिन्हें कि, इन्द्रकी वो सुधर्मा सभा जहाँ कि सदा उर्वशी जैसी लोकोत्तर सुन्दरियोंके नाच रंग हुआ करते हैं, कोई अनुराग न पैदा करे किंतु दुःखका ही साधन प्रतीत हो ऐसे पुरुषोंके लिये परा विद्याका उपदेश दिया जिसे कि, स्वसंवेद भी करते हैं। निरंजनके राज्यके अनन्त ब्रह्माण्ड है एक एकमें अनन्त अनन्त लोक हैं प्रत्येक लोकमें अनन्तोंही हैं एक ही यह भूमण्डल सात महा-द्वीपोंमें विभक्त हो रहा है एक ही जम्बूद्वीपमें भीतर एशिया आदि कई महाद्वीप संभाले जा रहे हैं। सृष्टिके पुरुषोंको ज्ञानोपदेश करनेका मार्ग एशियाका भारत वर्ष ही रहा है, सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश इसी पुण्यभूमिमें आये एवं यहीसे विश्वके मानव समाजको हितोपदेश मिला है। सृष्टिके आदिमें ऋषि महर्षियोंके द्वारा वेदके दिव्य प्रकाशसे संसार भरको सन्मार्ग दिखाया गया जो कि, महाभारतके समयसे पूर्वतक अक्षुण्ण बना रहा। द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण द्वापायनने उसे पुनः परिष्कृत कर दिया।
यद्यपि धर्मराज युधिष्ठिरजीके वंशधर उनके सत्यधाम पधारनेपर बीस पीढ़ी तक एक छत्र शासन करते रहे हैं किंतु जनमेजयके शासनके बाद उनका शासन सूत्र ढीला होने लग गया था इस बातकी साक्षी भारतका इतिहास दे रहा है। ऋषि मुनियोंको प्यारी तपोभूमि इस भारत वर्षमें अनेक तरहके मनमाने मत फैल गये थे। मनमाने देवता कल्पित करके उनके नाम पर मनमाने कार्य किये जा रहे थे, मद्यपलोग मद्यके सैकड़ों समुद्रोंको सोख डालनेवाले रौख मद्यप देवताओंकी कल्पना करके गूलरकेसे रंगकी मद्यको बोटलोंपर बोटलें उड़ा रहे थे। निष्कुरुण मांसप्रिय मनुष्योंने मांसका बाजार गरम कर रखा था। परस्त्रीगामियोंने अपनी विचित्र आराधनाके नामपर रजकियों और चाण्डालिनीतकोंको अपनी सिद्धिका साधन प्रसिद्ध किया था।
ऐसे अत्याचारियोंके नम्र अत्याचारोंसे सत्य पुरुषके सच्चे भक्त सताये जा रहे थे, उसकी दिव्य सन्देशमयी परा अपरा दोनों वाणियोंका मूलोच्छेद हो रहा था, उनके प्रेमी पुराने लकीरके फकीर कहकर घृणाके गड़देके नीचे दबाये जा रहे थे, इनकी दर्द भरी आवाज सत्यपुरुषके कान पड़ी उसका हृदय स्वाभाविकी दयासे एकदम द्रवीभूत हुआ। क्योंकि वो सत्यपुरुष असावधान नहीं था सत्य मार्गके खोजनेवालोंको उस समय भी वो अपना मार्ग बता देना चाहता था उसके भेजे हुए पथ प्रवर्तक भी उसका पूरा आचरण करके दिखा देना चाहते थे कि, इस प्रकार चलने पर अब भी सत्यलोक दूर नहीं है। ये सत्य पुरुषके सत्यलोकके आये हुए पक्के तत्त्वके देहवाले उसीके हंस थे, यदि ये केवल उपदेशकाही कार्य रखते तो कलियुगकी कलुषित भावनाओंको अपने ओजस्वी वचनोंसे निःशेष कर डालते। पर पर्वतोंकी कन्दराओंमें प्राचीन वृक्षोंकी खोदरोंमें पवित्र वनों एवम् एकात्मके पुण्य स्थलोंमें सत्यलोकोंके हंसोंके कृत्य कर २ कर दिखा रहे थे।
जिन्होंने इनके लोकोत्तर चरित्रको जान पाया, जिन्होंने उनके जीवन चरित्रोंपर दृष्टि डाल कर उन्हें अपना आदर्श बनाया वे अधिकारी मुक्तिपथको अधिकृत करके इस असारसे बन्धनोंको तिनकेकी तरह तोड़कर साकेत लोक चले गये पर जिन्होंने उन्हें नहीं समझ पाया ऐसे पुरुषोंको उनसे कोई लाभ नहीं पहुँचा। जिन्हें उनसे लाभ पहुँचा ऐसे जीवोंकी संख्या उंगलियोंपर गिनी जा सकती थी।
उस समय उनका इतना अधिक प्रचार नहीं हुआ कि, सर्व साधारण उनसे लाभ उठासकें। यह देख जगदीशने अधिकारी बना २ कर उसीके अनुसार उपदेश देना प्रारंभ किया।
भगवान् बुद्ध देवने महावीर स्वामीको साथ लेकर अहिंसाके उच्च सिद्धान्तके जय घोषसे भूमण्डलको व्याप्त कर दिया। विक्रमार्केन वैदिक विकासको निष्कांटक बना दिया, श्रीशङ्करस्वामीने